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गरासिया समाज का प्रसिद्ध दो दिवसीय मेला: गणगौर मेले में झलकी आदिवासी लोक कला की छटा

- सियावा में गरासिया समाज का आयोजन सम्पन्न

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आबूरोड के सियावा मेेले में उमड़े आदिवासी।

आबूरोड. स्थानीय आदिवासी भाषा में गीतों की धुन पर वालर नृत्य करती युवतियां, लोगों से खचा-खचा भरी सडक़ें, नदी किनारे झूमते आदिवासी... कुछ ऐसा ही नजारा गुरुवार को सम्पन्न हुए क्षेत्र के गरासिया समाज के प्रसिद्ध दो दिवसीय गणगौर मेले में देखने को मिला।
मेले में जिले समेत गुजरात व उदयपुर से भी आदिवासी पहुंचे। मेले के अंतिम दिन आदिवासी लोक संस्कृति की सुंदर छटा देखने को मिलीं। नए परिधानों में सज-धजकर पहुंचे आदिवासियों ने मेले का जमकर लुत्फ उठाया। मेला गुरुवार दोपहर परवान चढ़ा। दोपहर में गर्मी के बावजूद आदिवासियों की भीड़ में कोई कमी नहीं थी। युवक-युवतियां जीप-ऑटो, बसों के माध्यम से मेला स्थल पहुंचे। करीब एक किलोमीटर तक सियावा पुलिया के दोनों तरफ व नदी में सैकड़ों आदिवासियों का नजारा देखते ही बन रहा था। सियावा में हर वर्ष भरने वाला यह मेला प्रदेशभर में इसके देशी अंदाज व लोक नृत्य, गीतों आदि के लिए प्रसिद्ध है। व्यंजनों व झूलों का आनंद लिया।
तहसीलदार मनसुखराम डामोर, प्रधान लालाराम गरासिया, पुलिस उपअधीक्षक विजयपालसिंह आदि ने जायजा लिया। सरपंच देवी, पंचायत समिति सदस्य मायाबेन, लखमाराम गरासिया, पूर्व सरपंच दौलाराम, मेला कमेटी अध्यक्ष भीखाराम, सोमाराम, सोनाराम आदि उपस्थित थे।

चुने जीवन साथी
आदिवासी मान्यता के मुताबिक मेले में युवक-युवतियां अपना पसंदीदा जीवन साथी चुनते हैं। एकदूसरे का हाथ थामकर चलते नजर आए। सहेलियों संग एक-दूसरे के गले में बाहें डालकर चलती दिखाई दीं। वाहनों में सवार युवतियां व महिलाएं आदिवासी भाषा में गीत गुनगुनाती रहीं।

युवतियों ने अंग्रेजी में गुदवाए टेटू
परम्पराओं व रीति-रिवाजों के लिए प्रसिद्ध गरासिया समाज के इस मेले में युवतियों का अंग्रेजी का क्रेज देखने को मिला। मेले में कई युवतियां स्वयं व प्रियतम का नाम अंग्रेजी में गुदवाती दिखाई दीं। कई महिलाओं की झुलकी पर लिखे नाम भी अंग्रेजी में ही उकेरे गए थे।

नृत्य ने किया मोहित
मेले में युवतियों ने पारम्परिक परिधान, कंदोरा, हाथपुन, होअरी, कड़ले, तोड़े आदि आभूषण पहनकर नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी। युवतियों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर जगह-जगह घेरा बनाकर लोकगीत गाते हुए वालर व लूर नृत्य किया। नदी किनारे गणगौर पूजा की गई। इसके बाद महिलाएं ईसर-पार्वती की प्रतिमा सिर पर उठाकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य कर रही थीं। सिर पर ज्वारा उठाकर नृत्य कर रही बालिकाओं ने सभी को आकर्षित किया। महिलाओं के कमर में बंधे चांदी के कंदोरे, जेवर व घुंघरुओं की खनखनाहट सुनाई दे रही थी।

झूलों व खान-पान का उठाया लुत्फ
लोगों ने मेले में विभिन्न प्रकार के झूलों व ठेलों पर खरीदारी का लुत्फ उठाया। चकरी, ड्रेगन राइड, मौत का कुआं आदि का लुत्फ उठाया। बच्चों के लिए छोटे झूले भी आकर्षण का केन्द्र रहे। खिलौनों की जमकर खरीदारी की। घरेलू सामग्री, सौंदर्य प्रसाधन की खरीद की गई। ठेलों पर आइसक्रीम, जूस, शीतल पेय के लिए खासी भीड़ रही।

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