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टैंक है, पाइपलाइन है, पर पानी नहीं

बेशक तलहटी पॉश इलाकों में शुमार है, पर इस इलाके में गोलिया बस्ती व इंदिरा कॉलोनी सरीखी गरीब बस्तियां भी है। दोनों बस्तियों के इर्द-गिर्द गगनचुम्बी इमारतें खड़ी है और उनमें सारी सुख सुविधाएं है, पर बस्ती के वाशिंदों को भीषण गर्मी के दौर में पानी के लिए भी तरसना पड़ रहा है।

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टोंक

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Amar Singh Rao

Jun 08, 2017

बेशक तलहटी पॉश इलाकों में शुमार है, पर इस इलाके में गोलिया बस्ती व इंदिरा कॉलोनी सरीखी गरीब बस्तियां भी है। दोनों बस्तियों के इर्द-गिर्द गगनचुम्बी इमारतें खड़ी है और उनमें सारी सुख सुविधाएं है, पर बस्ती के वाशिंदों को भीषण गर्मी के दौर में पानी के लिए भी तरसना पड़ रहा है। गर्मी क्या, सर्दी व बारिश में भी उन्हें पीने का पानी सहजता से मयस्सर नहीं हो पाता। दिलचस्प बात तो यह है कि गोलिया बस्ती में बकायदा पानी का ओवर हैड टैंक बना हुआ है और एक नहीं वरन् तीन-तीन जलस्रोतों से जुड़ा हुआ है, पर विडम्बना यह है कि टंकी में पानी नहीं भरा जाता। टंकी में पानी के अभाव में सार्वजनिक नलों से पानी टपके लम्बा अर्सा हो गया है। बस्ती के वाशिंदों ने जिला प्रमुख, विधायक, जलदाय विभाग के अधिकारियों व प्रशासनिक अधिकारियों से कई बार गुहार लगा ली। हर बार सभी ने भरोसा दिलाया, कि अब दोनों बस्तियों की महिलाओं को सिर पर मटके व कमर में नन्हे-मुन्नों को उठाकर पीने का पानी लाने के लिए व्यस्ततम हाईवे पार कर जान को जोखिम में नहीं डालनी पड़ेगी। भरोसा दिलाने के बाद दो-चार दिन सबकुछ ठीक-ठाक रहता है, पर बाद में हालात पूर्ववत हो जाते हैं।
पानी पिलाने में नहीं किसी को कोई रूचि
दरअसल न तो अधिकारियों को और न ही जनप्रतिनिधियों को इसमें दिलचस्पी है कि गोलिया बस्ती व इंदिरा कॉलोनी के वाशिंदों को घर बैठे पर्याप्त पानी मिले। अगर ऐसा नहीं होता तो स्वजल धारा योजना के तहत बने ओवरहैड टैंक को भरने के लिए पहले कारोली के ट्यूबवैल से जोड़ा गया। बाद में महज फर्लांग भर की दूरी पर स्थित खुले कुएं से जोड़ा गया। बाद में जब जिला प्रमुख पायल परसरामपुरिया ने झकझोरा तो तीसरी बार पांडुरी के खुले कुएं से जोड़ा। हर बार पांच-दस दिन टंकी भरी और बाद में फिर से वही हाल। एक मोटे अनुमान के तौर पर टंकी बनाने से लेकर अब तक पचास लाख रुपए खर्च कर दिए, पर गोलिया बस्ती के वाशिंदों को पानी नहीं मिला।
हाईवे पार करने की कैसी है विडम्बना
बस्ती की तमाम महिलाएं व्यस्ततम आबूरोड-माउंट रोड पार कर तलहटी जाती है और वहां से मटके सिर पर उठाकर ले आती है। कभी बच्चे कमर में उठाए होते है तो कभी मां की अंगुली पकड़कर चलते है। मां व बच्चों दोनों के लिए हाईवे पार करना आसान नहीं है, पर महिलाएं करें क्या। पीने का पानी तो चाहिए है। गोलिया बस्ती के वाशिंदों ने बताया कि स्कूल खुला था तब मारसाब अपनी जेब से पानी का टैंकर डलवाकर बच्चों के लिए पीने के पानी की सुविधा करते थे। लोगों ने बताया कि पिछले डेढ़ दशक से यही हाल है। उच्चाधिकारी या नेता को कहते है तो वे मौके पर अधिकारियों को निर्देश देकर चले जाते हैं। बाद में कभी पूछते तक नहीं कि लोगों को पानी मिल रहा है या नहीं।
इन्होंने बताया ...
हमने तो टैंक को पांडुरी से जोड़कर जलापूर्ति शुरू कर दी थी, पर इसे चलाना तो स्वजल धारा योजना की कमेटी को ही है। मोटर चालू करने, टैंक भरने व पाइपलाइन का रख-रखाव का काम तो कमेटी करेगी, तब ही बात बन पाएगी।
- हेमन्त गोयल, एईएन, जलदाय विभाग, आबूरोड।


क्यों चलाएगी स्वजल धारा कमेटी। तत्कालीन जिला कलक्टर वी. सरवनकुमार व तत्कालीन प्रभारी मंत्री ओटाराम देवासी ने पूरी स्कीम ही जलदाय विभाग को टेकओवर करने के आदेश दिए थे। अब जलदाय विभाग मुकर रहा है।
- रावताराम देवासी, महामंत्री, भाजयुमो ग्रामीण मंडल, आबूरोड।