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मशरूम से रोक रही हैं पहाड़ों का पलायन

दिव्या कहती हैं कि उन्होंने मशरूम को इसलिए चुना क्योंकि इसे हर किसान उगा सकता है।

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lalit fulara

Aug 24, 2016

divya rawat

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ललित फुलारा

देहरादून। पहाड़ से पलायन रोकना है तो रोजग़ार देना पड़ेगा, जब दिव्या रावत यह कहती हैं, तो उनकी आवाज में वो दर्द और वेदना झलकती है, जिसे पहाड़ के युवा सदियों से झेल रहे हैं। दिव्या, गांव-गांव में मशरूम की खेती के प्रति अलख जगा रही हैं। वह कहती हैं, मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं। दिल्ली से सोशल वर्क में मास्टर डिग्री ली, दो साल एक एनजीओ के साथ जुड़कर काम किया और फिर लौट आई अपने गांव।

प्रोडक्ट नहीं मिशन है मशरूम

बकौल दिव्या, मशरूम उनके लिए प्रोडक्ट नहीं मिशन है। इसे कोई भी उगा सकता है। यह 15-20 दिन से लेकर एक महीने के भीतर तैयार हो जाता है। पहाड़ों में खेती को सबसे ज्यादा डर बंदर, लंगूर और जंगली सुअरों से है लेकिन मशरूम के साथ ऐसा नहीं है। इसका उत्पादन कमरों के भीतर किया जाता है। दिव्या की मेहनत और लगन की बदौलत चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी और टिहरी जिलों में मशरूम की 15 से ज्यादा यूनिट खोल चुकी हैं। युवा जुड़ रहे हैं और मशरूम की खेती का हुनर सीख रहे हैं। मोथरोवाला में उनकी खुद की प्रयोगशाला है और वह सौम्या फूड प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी भी चलाती हैं।


हर किसान कर सकता है मशरूम की खेती

दिव्या कहती हैं कि उन्होंने मशरूम मिशन को इसलिए चुना क्योंकि इसे हर किसान उगा सकता है। एक दो-महीने में मशरूम तैयार हो जाता है। किसान इसे सालभर उगा सकते हैं और यह बाजार में 80 से 100 रुपए किलो बिकती है। दिव्या बताती हैं कि वह आठ महीनों में पांच लाख रुपए की मशरूम उगा चुकी हैं। उनके प्रोडक्शन यूनिट की कोस्ट एक से दो करोड़ है। गांव-गांव में लगातार मशरूम की छोटी-छोटी यूनिट खुल रही हैं।


मशरूम के उत्पादन में आने वाली चुनौती के बारे में दिव्या कहती हैं कि ना कोई बताने वाला था और ना ही कोई प्रतिस्पर्धा थी। दिव्या कहती हैं कि युवाओं को कंफर्ट जोन तोड़ सोच आगे बढ़ाने की जरूरत है। 10 से पांच वाली नौकरी युवाओं को बांध देती है ऐसे में वो जो नया करना चाहते हैं उसे नहीं कर पाते हैं।