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और कितनी जान जाने के बाद चेतेंगे!

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अमरसिंह राव
सि रोही में फोरलेन पर बनी टनल का मलबा ढहने से चार श्रमिकों की मौत कई सवाल छोड़ गई। सबसे बड़ा सवाल यह कि बिना सुरक्षा सुपरवाइजर और साजो-सामान के श्रमिकों को ऐसे कार्यों में लगाया किसने और क्यों? क्या जवाबदेह कम्पनी ने इनको नियोजित किया था या ठेकेदार ने ही मर्जी से इन्हें ऐसे जोखिम भरे कार्यों में लगाया? लगाया तो इन्हें किस तरह के सुरक्षा कवच उपलब्ध करवाए? यदि नहीं तो किसी की जान की कीमत लगाने का अधिकार किसने दिया? क्या मुआवजा देकर हादसे में काल-कवलित इन श्रमिकों की जिन्दगी कोई लौटा सकता है? इनके परिवारों की पीड़ा का कोई जख्म भर सकता है? यदि नहीं...तो जवाबदेह कम्पनी या ठेकेदार पर क्या बड़ी कार्रवाई हुई? क्यों जिम्मेदार लोग अब तक सलाखों में नहीं है? क्या सिर्फ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करने से जख्म भर जाएंगे?
इसके लिए जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। ये जवाबदेह कम्पनी के प्रतिनिधियों से पर्याप्त मुआवजा तक नहीं दिलवा पाए। परिजन प्रत्येक श्रमिक के परिजनों को ३० लाख रुपए मुआवजे की मांग कर रहे थे पर बंद कमरे में मौत की साधारण राशि तय कर दी गर्ई। क्या किसी के जवान बेटे की मौत की कीमत सिर्फ दस लाख रुपए ही है? बंद कमरे में और बाहर सिर्फ राजनीति की रोटियां सेंकी गईं।
विचारणीय पहलू यह है कि जब टनल हादसे में काल-कवलित चारों श्रमिकों को फोरलेन पर लगे पौधों को पानी पिलाने और साफ-सफाई का काम सौंप रखा था तो इन्हें ऐसे खतरनाक कार्यों पर लगाया क्यों? और किसके कहने पर? परिजनों तक ने इस बात को स्वीकार किया है कि श्रमिकों से टनल पर काम करवाने की उन्हें जानकारी नहीं दी गई।
निर्माण के बाद से ही टनल सही नहीं है। हमेशा पानी रिसता है। पत्थर गिरते हैं। वर्षा के दिनों में तो झरने चलने लगते हैं। टनल पर सुविधाओं में कमी को लेकर धरने-प्रदर्शन तक हुए। ऐसे हालात में टोल क्यों लिया जा रहा है? सिरोही शहर और मंडार की तरफ जाने वाले वाहन टनल का उपयोग किए बिना टोल देने को मजबूर हैं। सत्ता पक्ष के नेता क्यों नहीं केन्द्र सरकार के समक्ष प्रभावी पैरवी करते? जनहित के मामलों में अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले नेता इस मामले में मौन क्यों हैं?
वैसे प्रारंभ में एनएचएआई की कंसल्टिंग एजेंसी सिरोही में फोरलेन सेक्शन के किलोमीटर 219 से 224 तक के पांच चट्टानी क्षेत्रों को खतरनाक बताते हुए यातायात शुरू नहीं करने की सिफारिश भी कर चुकी थी फिर भी जिले के अधिकारियों और नेताओं ने टोल की छूट देकर लोगों की जान जोखिम में क्यों डाल दी? अभी तो वर्षा का मौसम शुरू हुआ है। लिहाजा अब इस असुरक्षित सफर और ऐसे हादसों पर स्थायी विराम लगाना होगा। नहीं तो ऐसा हादसा फिर होते देर नहीं लगेगी।