12 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नल के पानी में पाए गए रसायनों से कैंसर का खतरा 33% तक बढ़ा

एक नई और चिंताजनक स्टडी ने पाया है कि सार्वजनिक पीने के पानी में पाए जाने वाले PFAS रसायनों का संबंध अमरीका के कुछ इलाकों में कैंसर की दर बढ़ने से है। रिपोर्ट के अनुसार, नल के पानी से मिलने वाले इन रसायनों के संपर्क में आने से कैंसर का खतरा 33% तक बढ़ सकता है।

2 min read
Google source verification

जयपुर। आपने शायद PFAS यानी "फॉरएवर केमिकल्स" का नाम सुना होगा। ये कृत्रिम रसायन हैं, जिन्हें पानी, चिकनाई और गर्मी से बचाने के लिए बनाया गया था। इनका इस्तेमाल दशकों से नॉन-स्टिक कोटिंग, दाग-प्रतिरोधी कपड़े और पुरानी फायरफाइटिंग फोम में होता रहा है। समस्या यह है कि ये रसायन आसानी से टूटते नहीं हैं। मिट्टी, पानी, वन्यजीव और इंसानों के शरीर में ये जमा होते चले जाते हैं।

कैंसर से जुड़ा नया खतरा

एक नई और चिंताजनक स्टडी ने पाया है कि सार्वजनिक पीने के पानी में पाए जाने वाले PFAS रसायनों का संबंध अमरीका के कुछ इलाकों में कैंसर की दर बढ़ने से है। रिपोर्ट के अनुसार, नल के पानी से मिलने वाले इन रसायनों के संपर्क में आने से कैंसर का खतरा 33% तक बढ़ सकता है।

रिसर्च कैसे हुई

कैलिफोर्निया की यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया (USC) के Keck School of Medicine के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। उन्होंने काउंटी स्तर पर कैंसर के आंकड़ों को पानी की जांच रिपोर्ट से मिलाया। 2010 के दशक में हजारों पब्लिक वाटर सिस्टम्स की PFAS जांच हुई थी, और हाल में और सटीक टेस्टिंग भी की जा रही है। दोनों डेटा सेट को मिलाकर वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि जहां पानी में PFAS मिला, वहां कैंसर की दर भी ज्यादा थी। उन्होंने धूम्रपान, मोटापा, आय, शहरी-ग्रामीण फर्क और वायु प्रदूषण जैसे अन्य कारणों को भी ध्यान में रखा, ताकि नतीजे साफ़ निकल सकें।

किस तरह के कैंसर बढ़े

पुरुषों में: किडनी और ब्लैडर कैंसर, नर्वस सिस्टम कैंसर, ल्यूकेमिया और सॉफ्ट टिशू कैंसर।
महिलाओं में: सबसे बड़ा असर थायरॉयड कैंसर में दिखा। इसके अलावा मुंह और सॉफ्ट टिशू कैंसर भी सामने आए।

पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र और हार्मोन से जुड़े कई अन्य कैंसर भी ज्यादा पाए गए।

PFAS क्यों खतरनाक हैं

PFAS रसायनों का परिवार बहुत बड़ा है, लेकिन इनमें कुछ समान गुण होते हैं:

  • हार्मोन सिग्नलिंग में दखल, खासकर थायरॉयड में।
  • लीवर पर असर और फैट मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ना।
  • शरीर में क्रोनिक इंफ्लेमेशन यानी लंबे समय तक सूजन पैदा करना।
  • जीन के कामकाज में बदलाव लाना।

ये सभी वजहें PFAS और कैंसर के बीच संबंध को संभव बनाती हैं।

आगे क्या किया जा सकता है

-अमरीका में अब PFAS पर कड़े मानक तय किए जा रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि और सख्ती जरूरी है।
-घरों में इस्तेमाल होने वाले फ़िल्टर (जैसे एक्टिवेटेड कार्बन और रिवर्स ऑस्मोसिस यूनिट्स) PFAS को कम कर सकते हैं, बशर्ते उनकी समय पर देखभाल हो।
-पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट में PFAS के आंकड़े पढ़ना और समझना जरूरी है।
-ग्रामीण और शहरी जल संयंत्रों के लिए अलग-अलग तकनीक अपनानी होगी, ताकि PFAS को जड़ से हटाया जा सके।

नतीजा

यह अध्ययन बताता है कि अमेरिका में सार्वजनिक पानी में पाए जाने वाले PFAS रसायनों से कैंसर का खतरा काउंटी स्तर पर 33% तक बढ़ जाता है।हालांकि यह व्यक्तिगत स्तर पर सीधा सबूत नहीं है, लेकिन पैटर्न साफ है कि ये रसायन इंसान के शरीर पर हानिकारक असर डालते हैं। समुदायों को यह जानने का अधिकार है कि उनके पानी में क्या है और सरकार व संस्थाएं इसे कम करने के लिए क्या कदम उठा रही हैं। यह स्टडी Journal of Exposure Science & Environmental Epidemiology में प्रकाशित हुई है।