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शहरों की रोशनी से पक्षी देर तक जागते रहते हैं : अध्ययन

रोशनी से प्रभावित क्षेत्रों में पक्षी औसतन हर दिन 50 मिनट ज्यादा गाते रहे। कुछ प्रजातियां एक घंटा पहले जाग जाती हैं और एक घंटा बाद में सोती हैं।

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जयपुर। शोध में पाया गया है कि शहरों में रहने वाले पक्षी, गांवों में रहने वाले पक्षियों की तुलना में देर से सोते हैं। इसका कारण कृत्रिम रोशनी यानी लाइट पॉल्यूशन है। यह अध्ययन पक्षी प्रेमियों द्वारा भेजी गई रिकॉर्डिंग्स पर आधारित है, जिन्हें एक लोकप्रिय वेबसाइट पर अपलोड किया गया था। नतीजों से पता चला कि रोशनी से प्रभावित क्षेत्रों में पक्षी औसतन हर दिन 50 मिनट ज्यादा गाते रहे। कुछ प्रजातियां एक घंटा पहले जाग जाती हैं और एक घंटा बाद में सोती हैं। शोधकर्ता डॉ. ब्रेंट पीज़ (सदर्न इलिनॉय यूनिवर्सिटी, कार्बनडेल) ने कहा, “हम इन परिणामों से हैरान थे। सबसे ज्यादा रोशनी वाले इलाकों में पक्षियों का दिन लगभग एक घंटा बढ़ जाता है।” अध्ययन में यह भी सामने आया कि पृथ्वी की लगभग 23% सतह अब कृत्रिम रोशनी से प्रभावित है और यह तेजी से बढ़ रही है। रोशनी का असर न सिर्फ इंसानों की सेहत पर पड़ता है, बल्कि कीड़े-मकौड़े, चमगादड़ और समुद्री कछुओं जैसी कई प्रजातियों पर भी बुरा असर देखा गया है। यह शोध BirdWeather नामक प्रोजेक्ट से लिए गए आँकड़ों पर आधारित था, जिसमें लोग अपने इलाके के पक्षियों की आवाज़ रिकॉर्ड कर अपलोड करते हैं। वैज्ञानिकों ने 26 लाख सुबह की आवाज़ों और 18 लाख शाम की आवाज़ों का विश्लेषण किया और इन्हें सैटेलाइट से मिले लाइट पॉल्यूशन के डेटा से जोड़ा। नतीजों में पाया गया कि जिन पक्षियों की आँखें उनके शरीर की तुलना में बड़ी होती हैं, वे रोशनी से ज्यादा प्रभावित हुए। उदाहरण के तौर पर, अमेरिकन रॉबिन, नॉर्दर्न मॉकिंगबर्ड और यूरोपियन गोल्डफिंच का दिन औसत से ज्यादा बढ़ा। जबकि छोटी आँखों वाले पक्षी, जैसे गौरैया, पर ज्यादा असर नहीं हुआ। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। डॉ. पीज़ ने कहा, “इंसानों की तरह नींद की कमी पक्षियों के लिए कितनी हानिकारक है, यह हमें ठीक-ठीक नहीं पता। प्रवास (migration) के समय पक्षी नींद की कमी से निपटने के अलग तरीके अपनाते हैं।” फिर भी प्राकृतिक व्यवहार में यह बदलाव चिंता का विषय है। कुछ प्रजातियों में यह भी देखा गया है कि कृत्रिम रोशनी की वजह से भोजन खोजने और प्रजनन का समय बढ़ जाता है और बच्चों के जीवित रहने की संभावना बेहतर होती है। यह अध्ययन साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है।