परसाई ने 18 वर्ष की उम्र में जंगल विभाग में नौकरी की। खंडवा में 6 महीने अध्यापन कार्य किया। दो वर्ष (1941-43) जबलपुर में स्पेस ट्रेनिंग कॉलेज में शिक्षण की उपाधि ली। 1942 से वहीं माडल हाई स्कूल में अध्यापन किया। 1952 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी दी, 1953 से 1957 तक प्राइवेट स्कूलों में नौकरी की। 1957 में नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र लेखन की शुरूआत कर दी। जबलपुर से वसुधा नाम की साहित्यिक मासिकी निकाली, नई दुनिया में सुनो भइ साधो, नयी कहानियों में पाँचवाँ कालम और उलझी-उलझी तथा कल्पना इत्यादि कहानियां, उपन्यास एवं निबन्ध लेखन के बावजूद मुख्यत: व्यंग्यकार के रूप में विख्यात हुए। परसाई मुख्यत: व्यंग -लेखक थे, उनका व्यंग केवल मनोरजन के लिए नहीं था।