
सदी के अंत तक 100 करोड़ से अधिक गाय होंगी हीट स्ट्रेस से पीड़ित
पेरिस। जलवायु परिवर्तन यूं ही जारी रहा तो सदी के अंत तक दुनियाभर में 100 करोड़ से अधिक गायों के गर्मी के तनाव से पीड़ित होने की आशंका है। अत्यधिक गर्मी मवेशियों को कई तरह से नुकसान पहुंचाती है, खासकर जब यह उच्च आद्र्रता के साथ मिलती है। यह प्रजनन क्षमता को घटाती है, बछड़ों के विकास को बाधित कर देती है और इसके परिणामस्वरूप मृत्यु में वृद्धि हो सकती है। दक्षिण अफ्रीका के क्वाजुलु-नटाल विश्वविद्यालय के शोध में पाया गया है कि विश्व में 10 में से लगभग आठ गाय पहले से ही शरीर के उच्च तापमान, बढ़ी हुई श्वसन दर और हांफने का अनुभव कर रही हैं, ये सभी लक्षण भीषण गर्मी के तनाव से जुड़े हैं। उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों में 20 प्रतिशत मवेशी सालभर इन लक्षणों को झेलते हैं। यदि अमेजन और कॉन्गो बेसिन में पशुपालन का विस्तार जारी रहा तो ये संख्या बढऩे का अनुमान है, जहां तापमान वैश्विक औसत से अधिक तेजी से बढ़ रहा है।
पशुधन के विस्तार के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई:
भविष्य में कार्बन उत्सर्जन बढ़ा तो दुनियाभर में 10 में से नौ गाय प्रति वर्ष 30 या अधिक दिन और सदी के अंत तक 10 में से तीन से अधिक सालभर गर्मी के तनाव का अनुभव करेंगी। शोध में चेताया गया है कि ग्रीनहाउस गैसों से 2100 तक ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, उत्तरी भारत, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और मध्य अमरीका में हीट स्ट्रेस सालभर की समस्या बन जाएगा। पशुधन के विस्तार के लिए उष्णकटिबंधीय वनों का सफाया हो रहा है। अनुमान है कि आने वाले समय में एशिया और लैटिन अमरीका में पशुपालन लगभग दोगुना और अफ्रीका में चार गुना से अधिक बढ़ जाएगा। लेकिन यह उचित विकास नहीं है क्योंकि इससे जलवायु परिवर्तन बद्दतर हो रहा है और लाखों मवेशियों को गंभीर गर्मी के तनाव में डाल रहा है।
छोटे पशुपालकों पर पड़ रही ज्यादा मार:
ग्रीनहाउस गैसों पर पर्याप्त अंकुश लगाया जाए (इसमें जीवाश्म ईंधन में कटौती और पशुपालन के विस्तार को सीमित करना शामिल है) तो एशिया में हीट स्ट्रेस से पीडि़त गायों की संख्या ५० फीसदी और अफ्रीका में 80 फीसदी तक घटाई जा सकती है। उच्च तापमान के कारण उपजे तनाव से वाणिज्यिक पशुपालकों को काफी नुकसान होने का खतरा है। अकेले अमरीका में इसकी लागत पहले से ही सालाना 1.7 अरब डॉलर है। हालांकि इन पशुपालकों के पास आमतौर पर बीमा, बैंकों के साथ अच्छे संबंध और गर्मी से संबंधित नुकसान से उबरने के लिए ऋण लेने की क्षमता होती है। लेकिन छोटे पशुपालकों को इसके असर से अपनी आजीविका खोनी पड़ सकती है।
भारत सहित कई देशों के लिए खड़ी होंगी मुश्किलें: उच्च ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से 2050 तक वैश्विक दुग्ध आपूर्ति में सालाना 1.1 करोड़ टन की कमी होने की आशंका है। बढ़ता तापमान और आद्र्रता पशुपालकों को इन नई स्थितियों के अनुकूल होने के लिए मजबूर करेगी, जैसे उन्हें जानवरों के लिए वेंटिलेशन, यहां तक कि पंखों आदि की व्यवस्था करनी होगी या गर्मी-अनुकूलित मवेशी नस्लों पर स्विच करना पड़ेगा। लेकिन ये उपाय भविष्य में गर्मी बढऩे के साथ महंगे होते जाएंगे और सभी जगहों पर संभव भी नहीं होंगे। इसका अर्थ है कि उन जगहों पर पशुपालन संभव नहीं रह जाएगा जहां यह वर्तमान में एक प्रमुख व्यवसाय है खासतौर से भारत, ब्राजील, पैराग्वे, उरुग्वे, उत्तर-पूर्वी अर्जेंटीना और पूर्वी अफ्रीकी देशों में।
Published on:
26 Aug 2023 11:14 am
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