
कविता-साजन आजा अबकी बार
प्रतिज्ञा भट्ट
आई फागुन की बयार, साजन आजा अबकी बार।
पलकें पथ को रही निहार, साजन आजा अबकी बार।।
बीता सावन, भादौ बीता, बीत गया मधुमास।
हर ऋतु ने उपजायी मन में, पिया मिलन कीआस।
तरसा मन,तरसे नैना हैं, तरसा देह-चकोर,
पूरणमासी पर जागे नित सुप्त सकल अहसास।।
आ जा फागुन कैसे बीते तुझ बिन प्राणाधार।।1।।
श्वेत-वसन पर रंग गुलाबी, मन को रहा लुभाय।
प्रीत रंग में रंगी चुनरिया, मुझको बड़ी सुहाय।
रंग तेरे रंग जाऊं मैं, तू मेरे रंग..रंग जाए,
ऐसा पक्का चढ़े रंग फिर छूटे नहीं छुड़ाय।।
रंगों की बरखा में झाूमे ये सारा संसार।।2।।
जब से पिय परदेस गए हो, पलभर मिला न चैन।
मन-मुंडेर की कोकिल व्याकुल, अकुलाए दिन-रैन।
कैसे धीर धरूं मैं साजन, कोई करो उपाय,
बाट जोहते मन हारा है, पथराए यह नैन।।
तुझ बिन सूना जीवन मेरा, सूने सब त्योहार।।3।।
फाल्गुन पर एक और कविता पढि़ए
जब से आया है फागुन
वसीम अहमद नगरामी
मस्त मल्हारें गाए मन।
जब से आया है फागुन।।
पोर-पोर में जगी अगन,
जब से आया है फागुन।
सजे-धजे हैं घर-आंगन,
जब से आया है फागुन।
मस्त-मस्त है जनजीवन,
जब से आया है फागुन।
फूला नहीं समाए मन,
जब से आया है फागुन।
मन ही मन बतियाए मन,
जब से आया है फागुन।
कुछ भी नहीं छिपाए मन,
जब से आया है फागुन।
झाूमे तन-इतराए मन,
जब से आया है फागुन।
मन में नहीं समाए मन,
जब से आया है फागुन।
देवर बन-बन जाए मन,
जब से आया है फागुन।
पुनि-पुनि देख रहा दर्पन,
जब से आया है फागुन।
विहंसा है उपवन-उपवन,
जब से आया है फागुन।
कलियां करती आलिंगन,
जब से आया है फागुन।
टेसू पर छाया यौवन,
जब से आया है फागुन।
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