
file photo
बाड़मेर. सनावड़ा की गैर- होली के दूसरे दिन धुलंडी को बाड़मेर से करीब 35 किमी दूर सनावड़ा गांव में गैर का रंग जमता है। पीढिय़ों से आंगी-बांगी के साथ ढोल की धमक औैर थाली की खनक के साथ जमने वाली गेर को देखने को हजारों लोग जुटते। करीब 100 गांवों से लोग गेर को देखने पहुंचते हैं। गेर का रंग ऐसा जमता है कि दोपहर बाद शुरू होता है जो देर रात तक चलता है और लोगों का हुजूम भी कम नहीं होता है।
गेर नृत्य
गोल घेरे में इस नृत्य की संरचना होने के कारण यह 'घेरÓ और कालांतर में गेर कहा जाने लगा है। नृत्य करने वालों को गेरिया कहते हैं। यह होली के दूसरे दिन धुलंडी से प्रारंभ होता है तथा 15 दिन तक चलता है। यह मेवाड़ व बाड़मेर क्षेत्र का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो पुरुषों द्वारा सामूहिक रूप से गोल घेरा बनाकर ढोल, बांकिया, थाली आदि वाद्य यंत्रों के साथ हाथों में डंडा लेकर किया जाता है।
ऐसा लगता है जैसे युद्ध क्षेत्र
इस नृत्य को देखने से ऐसा लगता है मानो तलवारों से युद्ध चल रहा है। नृत्य की सारी प्रक्रियाएं और पद संचलन तलवार युद्ध जैसी लगती है। मेवाड़ के गैरिए नृत्यकार सफेद अंगरखी, धोती व सिर पर केसरिया पगड़ी धारण करते हैं, जबकि बाड़मेर के गैरिए सफेद आंगी और तलवार के लिए चमड़े का पट्टा धारण करते हैं। पुरुष एक साथ मिलकर वृताकार रूप में नृत्य करते-करते अलग-अलग प्रकार का मंडल बनाते हैं
कणाना बाड़मेर का प्रसिद्ध गेर नृत्य
मेवाड़ और बाड़मेर के गैर नृत्य की मूल रचना एक ही प्रकार हैं लेकिन नृत्य की लय, चाल और मंडल में अंतर है। गेर के अन्य रूप भी है, जिनमें आंगी-बांगी(लाखेटा गांव), गैर नृत्य (मरु प्रदेश), तलवारों की गेर नृत्य ( मेवाड़-मेनार गांव ) के रूप में जानी जाती है। कणाना बाड़मेर का प्रसिद्ध गेर नृत्य है।
Published on:
17 Mar 2022 07:12 pm
बड़ी खबरें
View Allखास खबर
ट्रेंडिंग
