
Hurting Ananadata
आहत अन्नदाता
त्रिलोक शर्मा....
सिरोही . दा वे बड़े पर हकीकत बोनी दिख रही है। सरकार अन्नदाता की हितैषी और आय दोगुना करने का दंभ तो भरती है लेकिन पीड़ा नहीं सुन रही है। फिर योजनाएं लागू करने के जिम्मेदार नौकरशाह भी औपचारिकता में ही लगे हैं।
सरकार ने कृषि क्षेत्र में विभिन्न सब्सिडी की योजनाएं चला रखी हैं। इसके पीछे मंशा है कि फसलों की बुवाई से लेकर कृषि कार्य में किसानों को आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़े। इस कड़ी में सरकार प्रदर्शन आदि के नाम से गरीब किसानों को निर्धारित मात्रा में हजारों रुपए का खाद-बीज मामूली शुल्क पर देती है। इस सामग्री का सही मायने में किसानों को लाभ तभी मिल पाता है जब बारिश आने से कुछ दिन पहले मिल जाए। हकीकत इसके उलट है। अधिकांश कृषक इन योजनाओं से अनभिज्ञ हैं। खरीफ की बुवाई का समय आ गया लेकिन खाद-बीज उपलब्ध नहीं हैं। आखिर समय पर खाद-बीज की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती? कृषि सहायता के नाम से जारी बजट जाता कहां है? प्रकृति की मार के समक्ष बेबस धरतीपुत्र आखिर कब तक यूं ही ठगा जाएगा?
सिरोही जिले के भाखर क्षेत्र में कृषि सेवा केन्द्र बंद पड़े हैं। मक्का, चावल, तिल, मूंग व उड़द के बीज नहीं मिलने से किसान मजबूरन घर में रखा अनाज बो रहे हैं। आदिवासी मजदूरी के बाद खेती से आजीविका अर्जित करते हैं, इसके बावजूद इनको उन्नत किस्म के बीज मुहैया नहीं करवाए जा रहे हैं। वे घटिया किस्म के बीज बोने को विवश हैं। कई किसान गुजरात जाकर महंगे दाम में खरीदारी कर रहे हैं। अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही हालात हैं। अशिक्षित किसान को यही चिंता सताती है कि बारिश के समय बीजों का प्रबंध कहां से किया जाए? बीज खराब बो दिया तो फसल से भी वंचित रहने की पीड़ा से सरकार को सरोकार नहीं है।
कई गांवों में किराणा की दुकानों पर ही बीज बेचा जा रहा है। इस बीज की क्या प्रामाणिकता है? इसको लेकर कृषि विभाग के अधिकारी आंखें मूंदे हुए हैं। हालात ये हैं कि किसानों को घटिया बीज मिल गया तो इसकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं होगा?
गत वर्ष की अतिवृष्टि से अधिकांश किसान उबर नहीं पाए हैं। उन्हें मुआवजे का इंतजार है। जिले को एक अरब 6 करोड़ की मुआवजा राशि स्वीकृत की गई। अब तक 20 करोड़ रुपए का ही भुगतान हो पाया है। मंगलवार को भाजपा जिलाध्यक्ष लुम्बाराम चौधरी को जिला कलक्टर को पत्र भेजकर भुगतान शीघ्र करवाने का अनुरोध करना पड़ा। यह दर्शाता है कि सरकार किसानों के दर्द पर मरहम लगाने के प्रति कितनी सजग है।
इसका दूसरा पहलू यह है कि वर्तमान में अधिकांश जगह प्रकृति पर निर्भर कृषि क्षेत्र के लिए वैकल्पिक रोजगार और अवसरों के सृजन की जरूरत है। ऐसा नहीं होने से कर्ज तले दबा किसान जान देने से भी गुरेज नहीं कर रहा। शहर ही नहीं अपितु गांवों में भी कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखते हुए रोजगार के नए अवसर सृजित करने होंगे।
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