
जैसलमेर. संरक्षण और पर्यटन विकास से जूनी धन्वा भविष्य में जैसलमेर की प्रमुख धरोहरों में हो सकेगा शामिल।
जैसलमेर. सरहदी जिले की ऐतिहासिक विरासत में शामिल प्राचीन जूनी धन्वा एक बार फिर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हाल के वर्षों में हुए पुरातात्विक शोध, जिला प्रशासन के सर्वेक्षण तथा धार्मिक गतिविधियों ने इस प्राचीन स्थल के संरक्षण और विकास की आवश्यकता को नई गति दी है। पालीवाल सभ्यता के समृद्ध अतीत को अपने भीतर समेटे यह स्थल इतिहास, संस्कृति, स्थापत्य कला और जल संरक्षण की प्राचीन तकनीकों का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जा रहा है। जैसलमेर शहर से लगभग 17 किलोमीटर दूर डाबला मार्ग पर स्थित तथा मुख्य सड़क से करीब छह किलोमीटर भीतर बसे जूनी धन्वा के खंडहर आज भी एक विकसित और समृद्ध बस्ती के अस्तित्व की गवाही देते हैं।
ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि यहां कभी लगभग 700 से 800 परिवार निवास करते थे। गांव में बने आवास, प्राचीन मंदिर, विशाल तालाब, कुंड, बेरी, बावड़ियां और पशुओं के लिए निर्मित खेलियां उस दौर की समृद्ध सामाजिक व्यवस्था और उन्नत जल संरक्षण प्रणाली को दर्शाती हैं। मरुस्थलीय क्षेत्र में पानी के सुनियोजित प्रबंधन का यह उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। चारों ओर पहाड़ियों से घिरे इस गांव की बसावट तत्कालीन नगर नियोजन और स्थापत्य कला की विकसित समझ को भी सामने लाती है। सीमित संसाधनों के बावजूद यहां जल संचयन और संरक्षण के लिए अपनाई गई तकनीकें आज भी शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई हैं।
ऐतिहासिक महत्व के बीच जनवरी 2025 में शोधार्थी दिलीप माली और पार्थ जगाणी ने जूनी धन्वा क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन किया। अध्ययन के दौरान यहां से मुगलकालीन सभ्यता से जुड़े महत्वपूर्ण अवशेष और प्राचीन सिक्के प्राप्त हुए। इन अवशेषों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता की पुष्टि राजस्थान के विख्यात पुरातत्वविद् प्रोफेसर जीवनसिंह राठौड़ ने की। अध्ययन से यह संकेत मिला कि यह क्षेत्र विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में लगातार आबाद रहा तथा आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। शोध के बाद मई 2025 में जिला प्रशासन ने भी जूनी धन्वा का दौरा कर स्थल का सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के दौरान यहां मौजूद पुरातात्विक धरोहरों, जल संरचनाओं और प्राचीन मंदिरों का अवलोकन किया गया। इसके बाद इस स्थल के संरक्षण और पर्यटन की संभावनाओं को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा और तेज हुई।
वर्तमान में यहां स्थित प्राचीन मंदिरों की देखरेख सत्यनारायण जोशी कर रहे हैं। उनके प्रयासों से जूनी धन्वा में कृष्ण जन्माष्टमी, दीपावली, फागोत्सव सहित विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन नियमित रूप से आयोजित होने लगे हैं। इन आयोजनों से वर्षों से उपेक्षित यह ऐतिहासिक स्थल एक बार फिर श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र बन रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जूनी धन्वा का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए, आधारभूत सुविधाएं विकसित हों और पर्यटन की दृष्टि से योजनाबद्ध कार्य किया जाए तो यह स्थल जैसलमेर के प्रमुख विरासत पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। साथ ही, पालीवाल सभ्यता, मरुस्थलीय जीवन और प्राचीन जल संरक्षण तकनीकों के अध्ययन के लिए भी यह महत्वपूर्ण शोध केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।
जूनी धन्वा केवल प्राचीन खंडहर नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक इतिहास और गौरवशाली परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है। यहां मौजूद पुरातात्विक धरोहरों का संरक्षण और व्यापक प्रचार होना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक जड़ों से जुड़ सके। यदि इस स्थल को योजनाबद्ध रूप से विकसित किया जाए तो यह पर्यटन और शोध, दोनों क्षेत्रों में नई पहचान स्थापित कर सकता है।
— विनोद जोशी, समाजसेवी
जूनी धन्वा हमारी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का अनमोल प्रतीक है। इसके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि समाज को भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। प्रशासन, स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों के संयुक्त प्रयासों से इस धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। संरक्षण के साथ पर्यटन विकास को बढ़ावा मिलने से क्षेत्र की पहचान भी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगी।
— सुनील पालीवाल, अधिवक्ता व समाजसेवी
Published on:
14 Jun 2026 08:24 pm
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