
अमित वाजपेयी
खेल के नाम पर क्या देश की भावना से खेलना उचित है। भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है। देश के कई हिस्सों में पाकिस्तान की जीत के बाद खुशियां मनाई गईं। राजस्थान में भी ऐसे दो मामले सामने आए। यह अच्छे संकेत नहीं हैं। पाक की जीत पर खुशी मनाने वालों से नाराजगी के साथ उन सियासतदानों से भी शिकायत है, जो दोनों देशों के बीच तनाव के चरम के बावजूद क्रिकेट मैच कराने पर राजी हुए।
पाकिस्तान लगातार आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। बॉर्डर पर हमारे जवान शहीद हो रहे हैं। पाकिस्तान से तो बातचीत भी रुकी हुई है। ऐसे हालात में क्रिकेट मैच कराने का औचित्य समझ से परे है। सवाल उठता है कि क्या हालात सामान्य हुए बिना क्रिकेट डिप्लोमेसी के जरिए हम बातचीत का रास्ता खोज रहे हैं? देश के तमाम संवेदनशील लोगों में इस बात को लेकर हैरानी है। पाकिस्तान के प्रति हमारे रुख में बदलाव क्यों है? क्या इसकी वजह क्रिकेट मैच से होने वाली मोटी कमाई है।
पाकिस्तान के प्रति हमारी स्पष्ट नीति होनी चाहिए। जब तक वह आतंकी संगठनों को पनाह देने पर रोक नहीं लगाता तब तक हमें भी उससे किसी तरह के सम्बन्ध नहीं रखने चाहिए। अगर यह सोच है कि क्रिकेट डिप्लोमेसी के जरिये माहौल को हल्का करके दोनों देशों के रिश्ते सुधारे जा सकते हैं तो यह संभव नहीं लगता। आजादी के बाद से ही पाक को लेकर हमारे कटु अनुभव हैं। उसकी नीति और नीयत दोनों में खोट है। फिर भी हम क्रिकेट डिप्लोमेसी के जरिये आखिर क्यों संबंध सुधारने पर तुले हैं?
उलटे दोनों देशों के तनाव के बीच क्रिकेट मैच के नतीजे देश में माहौल खराब करते जरूर नजर आते हैं। खेल अपनी जगह है और दोनों देशों के बीच राजनयिक और व्यापारिक संबंध अपनी जगह हैं। अभी भी दोनों देशों के बीच रिश्तों में खासी कड़वाहट बनी हुई है। पाकिस्तान की जीत के बाद हमारे ही देश में कई जगह जश्न मनाया जाना कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। इन पर रोक लगाना जरूरी है। सरकार को तय करना होगा कि क्रिकेट जरूरी है या देश। जरूरी है कि जब तक पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता, तब तक उसके साथ क्रिकेट खेलने पर भी पूर्णत: रोक लगनी चाहिए।
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