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पुण्य तिथि : महान क्रांतिकारी देशभक्त थे मदनमोहन मालवीय

जीवन भर देश सेवा में लगे रहने वाले महामना का 12 नवंबर 1946 को 85 वर्ष की उम्र में बनारस में निधन हो गया

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Bhup Singh

Nov 11, 2015

Madan Mohan Malviya

Madan Mohan Malviya

पं. मदनमोहन मालवीय (महामना) का जन्म प्रयाग में (इलाहाबाद) 25 दिसंबर 1861 को हुआ था। उनके पिता का नाम पं. ब्रजनाथ व माता का नाम मूनादेवी था। वे अपने सात भाई-बहनों में 5वें पुत्र थे। उनके पिता संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे। संसार में सत्य, दया और न्याय पर आधारित सनातन धर्म सर्वाधिक प्रिय था। करुणामय हृदय, मन और वाणी के संयम, धर्म और देश के लिए सर्वस्व त्याग, वेशभूषा और आचार-विचार में मालवीयजी भारतीय संस्कृति के प्रतीक तथा ऋषियों के प्राणवान स्मारक थे। जीवन भर देश सेवा में लगे रहने वाले महामना का 12 नवंबर 1946 को 85 वर्ष की उम्र में बनारस में निधन हो गया।

मात्र 5 वर्ष की आयु में उनके माता-पिता ने उन्हें संस्कृत भाषा में प्रारंभिक शिक्षण लेने हेतु पं. हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में भर्ती किया, वहां प्राइमरी परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात एक अन्य विद्यालय में भेजा गया, जहां से शिक्षा पूर्ण कर वे इलाहाबाद के जिला स्कूल पढऩे गए। उन्होंने म्योर सेंट्रल कॉलेज (जो आजकल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है) से 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.ए.की उपाधि प्राप्त की।

मालवीयजी हिंदू सभ्यता के सजीव प्रतीक थे। उन्होंने हिन्दी-अंग्रेजी समाचार पत्रों में संपादन करके जनता को जगाया। सत्य, दया और न्याय पर आधारित जीवन जीने वाले मदनमोहन मालवीय का व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन, समान रूप से जनता द्वारा पूजित था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 वर्ष तक कांग्रेस की सेवा की। वह सन 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की।

उन्होंने हिंदू संगठन का शक्तिशाली आंदोलन चलाया लेकिन कांग्रेस को राजनीतिक प्रतिक्रियावाद और धार्मिक कट्टरता से मुफ्त रखा। हिंदू समाज और भारत की प्राचीन सभ्यता तथा विविध विधाओं एवं कला की रक्षा के लिए मालवीयजी ने विशेष कार्य किया। वह स्वभाव में बड़े उदार, सरल और शांतिप्रिय व्यक्ति थे। उनके कार्यों एवं व्यवहार के लिए जनमानस ने उन्हें महामना कहा था।

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