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208 किलो के कवच के साथ चलते थे राणा प्रताप

अकबर के डर के कारण अथवा राजा बनने की लालसा के कारण कई राजपूतों ने स्वयं ही अकबर से हाथ मिला लिया

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Abhishek Tiwari

Jan 29, 2016

maharana pratap

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उदयपुर। 29 जनवरी, भारत के महान योद्धा महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि है। इसी मौके पर हम बता रहे है महाराणा प्रताप से जुड़े कुछ अनछुए पहलु के बारे में। महाराणा प्रताप के नाम से भारतीय इतिहास गुंजायमान है। यह एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने मुगलों को छटी का दूध याद दिला दिया था। इनकी वीरता की कथा से भारत की भूमि गौरवान्वित है। महाराणा प्रताप मेवाड़ की प्रजा के राजा थे। वर्तमान में यह क्षेत्र राजस्थान में आता है। प्रताप राजपूतों में सिसोदिया वंश के वंशज थे। राणा प्रताप एक बहादुर राजपूत थे जिन्होंने हर परिस्थिती में अपनी आखरी सांस तक अपनी प्रजा की रक्षा की। इन्होंने सदैव अपने एवं अपने परिवार से उपर प्रजा को मान और सम्मान दिया। महाराणा प्रताप एक ऐसे शासक थे जिनकी वीरता को अकबर भी सलाम करता था। महाराणा प्रताप युद्ध कौशल में तो निपूण थे ही साथ ही वे एक भावुक एवं धर्म परायण भी थे। उनकी सबसे पहली गुरु उनकी माता जयवंता बाई जी थी। महाराणा प्रताप के पिता का नाम राणा उदय सिंह था। इनकी शादी महारानी अजबदे पुनवार से हुई थी। महाराणा प्रताप और अजबेद के पुत्रों का नाम अमर सिंह और भगवान दास था। अजबदे प्रताप की पहली पत्नी थी, इसके आलावा इनकी 11 पत्नियाँ और भी थी। प्रताप के कुल 17 पुत्र एवम 5 पुत्रियां थी। जिनमे अमर सिंह सबसे बड़े थे। वे अजबदे के पुत्र थे। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 और मृत्य 29 जनवरी 1597 को हुई थी। महाराणा प्रताप के मृत्यु के बाद अमर सिंह ने मेवाड़ की राजगद्दी संभाली थी।

महाराणा को राजा बनते नहीं देखना चाहते थे उनके सौतेले भाई

महारानी जयवंता के अलावा राणा उदय सिंह की और भी पत्नियां थी जिनमे रानी धीर बाई उदय सिंह की सबसे प्रिय पत्नी थी। रानी धीर बाई चाहती थी कि उनका पुत्र जगमाल राणा उदय सिंह का उत्तराधिकारी बने। इसके अलावा राणा उदय सिंह के दो पुत्र शक्ति सिंह और सागर सिंह भी थे। इनमे भी राणा उदय सिंह के बाद राजगद्दी संभालने की मंशा थी लेकिन प्रजा और उदय सिंह दोनों ही प्रताप को उत्तराधिकारी के तौर पर मानते थे। इसी कारण तीनो भाई प्रताप को पंसद नहीं करते थे।

प्रताप के खिलाफ था राजपूताना

अकबर के डर के कारण अथवा राजा बनने की लालसा के कारण कई राजपूतों ने स्वयं ही अकबर से हाथ मिला लिया था। इसी को हथियार बनाकर अकबर ने राणा उदय सिंह को भी अपने आधीन करना चाहा पर ऐसा हो न सका। अकबर ने राजा मान सिंह को अपने ध्वज तले सेना का सेनापति बनाया इसके आलावा तोडरमल, राजा भगवान दास सभी को अपने साथ मिलाकर 1576 में प्रताप और राणा उदय सिंह के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। और इसी के साथ शुरू हुआ हल्दीघाटी का युद्ध।

हल्दीघाटी का युद्ध

1576 में राजा मान सिंह ने अकबर की तरफ से 5000 सैनिकों का नेतृत्व किया और हल्दीघाटी पर पहले से 3000 सैनिको को तैनात कर युद्ध का बिगुल बजाया। दूसरी तरफ अफ़गानी राजाओं ने प्रताप का साथ निभाया, इनमे हाकिम खान सुर ने प्रताप का आखरी सांस तक साथ दिया। हल्दीघाटी का यह युद्ध कई दिनों तक चला और अंत में यह युद्ध अकबर जीता नहीं और प्रताप हारे नहीं। युद्ध के बाद कई दिनों तक जंगल में जीवन जीने के बाद मेहनत के साथ प्रताप ने नया नगर बसाया जिसे चावंड नाम दिया गया। अकबर ने बहुत प्रयास किया लेकिन वो प्रताप को अपने अधीन नहीं कर सका।

महाराणा प्रताप और उनका घोड़ा चेतक

इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप के बहादुरी की चर्चा की हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। कहा जाता है कि चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था। कुछ लोकगीतों के अलावा हिंदी कवि श्यामनारायण पांडेय की वीर रस कविता चेतक की वीरता में उसकी बहादुरी की खूब तारीफ की गई है। हल्दी घाटी (1576) के युद्ध में उनके प्रिय घोड़े चेतक ने अहम भूमिका निभाई थी। हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है,जहां स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था। कहा जाता है कि चेतक भी राणाप्रताप की तरह ही बहादुर था। चेतक अरबी नस्ल का घोड़ा था। चेतक लंबी-लंबी छलांगे मारने में माहिर था। फादारी के मामले में चेतक की गिनती दुनिया के सर्वश्रेष्ठ घोड़ों में की गई है। हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप का अनूठा सहयोगी था वह। प्रताप शोध प्रतिष्ठान के मुताबिक दोनों का साथ चार साल तक रहा। कहते यहां तक हैं कि हल्दीघाटी युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की उंचाई तक तक बाज की तरह उछल गया था। फिर महाराणा ने मानसिंह पर वार किया था। जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी,तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी। वह अरबी नस्ल वाला नीले रंग का घोड़ा था। राजस्थान में लोग उसे आज भी उसी सम्मान से याद करते हैं, जो सम्मान वे महाराणा को देते हैं। वीरगति के बाद महाराणा ने स्वयं चेतक का अंतिम संस्कार किया था। हल्दीघाटी में उसकी समाधि है। मेवाड़ में लोग चेतक की बाहादुरी के लोकगीत गाते हैं।

208 किलो का सुरक्षा कवच लेकर चलते थे महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था, और उनके छाती का तवच 72 किलो का था। उनके भाले, कवच, ढ़ाल और दो तलवारों का वजन 208 किलो था।