ग़ुमनाम ज़िंदगी जी रहा Film Border का शहीद

Prabhat K Sharma

Updated: 24 Aug 2019, 07:30:50 PM (IST)

स्‍पेशल

वीर शूरमाओं की धरा शेरगढ़ के सोलंकियातला गांव में जन्मे भैरोंसिंह राठौड़ ने बीएसएफ ( bsf ) की 14 बटालियन में 1971 में जैसलमेर ( jaisalmer ) के लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात थे। भैरोंसिंह ( bhairon singh ) में अपने असाधारण शौर्य और वीरता का परिचय देते हुए पाक सैनिकों के दांत खट्टे किए थे। भारत-पाक सीमा ( indo pak border ) पर लोंगेवाला पोस्ट पर मेजर ( major ) कुलदीप सिंह की 120 सैनिकों की कंपनी के साथ डटकर सामना करते हुए भैरोंसिंह ने पाकिस्तान ( pakistan ) के टैंक ( tank ) ध्वस्त कर दिए और अपनी एमएफजी ( mfg ) से कई पाकिस्तानी दुश्मनों को ढेर कर दिया। शौर्यवीर भैरोंसिंह की वीरता और पराक्रम के चलते सन 1997 में रिलीज हुई बॉर्डर ( border ) फ़िल्म ( film ) में सुनील शेट्टी ( suniel shetty ) ने राठौड़ का रोल किया था। फ़िल्म में भैरोंसिंह को शहीद बताया गया था, लेकिन असल जिंदगी में फ़िल्म के रीयल हीरो भैरोंसिंह अपनी सरजमीं सोलंकियातला में गुमनामी की जिन्दगी जी रहे है। भैरोंसिंह बताते हैं कि बॉर्डर फ़िल्म में उनके रोल को दिखाना एक गर्व की बात है, युवाओं में जोश भरने जैसा है। लेकिन शहीद के रूप में फिल्माना गलत है।
राजस्थानी कवि और शेरगढ़ के सूरमा पुस्तक ( book ) के लेखक ( writer ) मदनसिंह राठौड़ सोलंकिया तला ने सेना मेडल विजेता शौर्यवीर राठौड़ की वीरता के लिए पंक्तियां लिखी.......
सिरै परगनौ शेरगढ, थळ आथूंणी थाट।
दीसै सूरा दीपता, मुरधर री इण माट।।
सूरा जलमै शेरगढ, रमता धोरां रेत।
सीम रुखाळै सूरमा, हेमाळै सूं हेत।।
हाथ पताका हिंद री, ऊंची राख उतंग।
भळहळ ऊभौ भैरजी,उर में देश उमंग।।
सन इकोत्तर साल में, टणकी तोफां तांण।
सरहद लड़ियौ सूरमौ, भैरू कुळ रौ भांण।।
भलां जनमियौ भैरजी, जबरा किया जतन्न।
सुनिल शैट्टी रोल कियौ, बोडर फिल्म वतन्न।।
सन 1971 के युद्ध ( war ) मे उनके पराक्रम पर राठौड़ को तत्कालीन मुख्यमंत्री ( chief minister ) बरकतुल्लाह खान ( barkatulla khan ) ने सेना मैडल से नवाजा था। हालांकि बीएसएफ की तरफ से उनको सैन्य सम्मान के रूप में मिलने वाले लाभ और पेंशन अलाउंस अभी तक नहीं मिल पा रहा है। सन 1963 में बीएसएफ में भर्ती होकर राठौड़ 1987 में रिटायर्ड हुए थे, लेकिन आज 75 साल की उम्र में भी एक जवान की तरह दिनचर्या में जीवनयापन कर रहे हैं। अफसोस है तो बस यही कि जिस मिट्टी के लिए उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मनों का सामना किया, आज वही मिट्टी उनको सैन्य सम्मान, उसके लाभ और पेंशन अलाउंस दिलाने वाली फाइल पर गर्द बनकर छा गई है।

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