
miguel hernandez
नई दिल्ली | स्पेनी कविता में चले '27 की पीढ़ी और '36 की पीढ़ी नामक आंदोलनों के महत्त्वपूर्ण कवि थे मिगुएल हर्नान्देज। फासीवाद का विरोध करने पर तत्कालीन सरकार ने गिरफ्तार कर लिया और फांसी की सजा सुना दी। लेकिन फांसी होने से पहले ही यक्षमा से उनकी जेल में मृत्यु हो गई।
युद्ध और प्रेम की कविता
मिगुएल हेरनान्देज ने जीवन संगीत के सुरों को संघर्ष की तान पर कस कर युद्ध और प्रेम की कविता की रचना की।
कविताओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे
मिगुएल हेरनान्देज एक योद्धा-कवि थे और आम मेहनतकश लोगों की के दुखों-तकलीफों को उन्होंने अपनी कविताओं का विषय बनाया। मिगुएल ऐसे योद्धा कवि थे, जो इन लोगों की बात को सरल ढंग से दूसरों तक पहुंचाने के लिए अपनी कविता को हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे।
भेड़े चराते थे मिगुएल...
हिंदी के चर्चित साहित्यकार उदय प्रकाश ने मिगुएल की कुछ रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। अपने एक साक्षात्कार में वे मिगुएल के बारे में कहते हैं- वे मूल रूप से स्पेन के एक पिछड़े गांव के गड़रिये थे, जीवनयापन के लिए भेड़ चराते थे। लेकिन पढ़ने और कुछ लिखने की उनकी उत्कंठा बहुत तीव्र थी। पर होता यह था कि जब वह रात में ढिबरी की रोशनी में कोई किताब खोलते थे तो उनके पिता पिटाई चालू कर देते थे - कि अगर तू पढ़ लेगा तो भेड़ कौन चराएगा? लेकिन पढ़ने के नशे ने उनके लिखने के दरवाजे भी खोले। उन्होंने कविताएं लिखीं। विलक्षण कविताएं।
स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान...
स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान इस कवि ने रेडियो पर, बैरकों में, सैनिकों के बीच फासिस्टों के खिलाफ चल रहे संघर्ष में सांस्कृतिक मोर्चे की कमान संभाली। संघर्ष से सृजित मिगुएल हेरनान्देज की कविताएं मेहनतकश जनता, उसकी जिंदगी, खुशियों, उत्सव, आंसुओं, लड़ाइयों से गहरे जुड़ी थीं और यह जुड़ाव मात्र भावनात्मक जमीन पर नहीं था। महज 31 साल की उम्र में मिगुएल की मौत हो गई, लेकिन इसके बावजूद जन-संघर्षों में प्रत्यक्ष भागीदारी ने उसकी वर्ग चेतना को उन्नत बनाया।
प्रस्तुत है मिगुएल की एक रचना...
संघर्ष
मैं, हां मैं, जो यह सोचता था कि
यह उजाला इस बार मेरा है
मैंने खुद को सिर के बल
अंधेरे में गिरते हुए देखा
अपनी बेइंतहा प्यास से जूझते हुए
जो इस सुबह की मटमैली
चीजों के लिए बिलकुल नहीं थी
सबकुछ इतना
विराट इतना विस्तृत
हृदय की अंधी धड़कनों से भरा हुआ
मैं एक जेल हूं, एक कैदखाना जिसकी खिड़कियां
एक विराट चीखते हुए सन्नाटे की ओर खुलती हैं
मैं एक खुली हुई खिड़की हूं
टोहता हुआ कि
अंधेरे में कोई जिंदगी कहीं करीब से गुजरती है क्या?
ओह! लेकिन इस संघर्ष में फिर भी कोई सूरज की
दूर, कहीं रोशनी की एक लकीर है
अपनी परछाईं अपने पीछे छोड़ती हुई जो .....
पल भर में गायब हो जाती है।
(अनुवाद : उदय प्रकाश)
Published on:
07 Nov 2017 06:13 pm
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