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हैवानों की रूह कब कांपेगी?

हैवानों की रूह कब कांपेगी?

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प्रदेश में 5 महीनों में बलात्कार के 2298 मामले दर्ज, पुलिस की कार्रवाई धीमी

नरसिंहपुर के बीच शहर का इलाका। तमाम परिवारों की तरह वह परिवार भी गहरी नींद में था। महज पांच साल की बच्ची मां के बगल में सो रही थी। शायद दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह! लेकिन, नींद खुली तो मासूम नहीं थी। कुछ दूर मिली, तो बेहोशी की हालत में। उसके साथ किसी हैवान ने हैवानियत की थी। बात यहां सिर्फ नरसिंहपुर की नहीं है। पूरे प्रदेश में मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि मां-पिता अपनी बच्चियों का चेहरा देखकर सिहर उठते हैं। आज यह शहर। कल दूसरा। कभी कटनी, कभी सतना। भोपाल, इंदौर, जबलपुर। लगभग सभी शहरों में हैवानियत की शर्मसार करने वाली खबरें आ ही जाती हैं। पीडि़त का दर्द हर जगह एक जैसा। सिर्फ हैवानों के चेहरे बदल जाते हैं। यहां सवाल फिर वही, आखिर समाज में ऐसे हैवानों का इलाज क्या है? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? कानून का डर जरूरी है या समाज में जागरुकता लाना?

एक बात तय है कि अपराधियों के मन में कानून का खौफ होना ही चाहिए। लेकिन, प्रदेश में वारदातों के पहले और बाद में पुलिस का रवैया हमेशा आम लोगों में गुस्सा पैदा करने वाला होता है। पुलिस वारदात के पहले बेपरवाह रहती है। वारदात के बाद वर्दी का रौब दिखाती है। शर्मिंदगी की बात है कि पीडि़त पक्ष ज्यादातर मामलों में पुलिस की प्रताडऩा झेलता है। नरसिंहपुर में भी बच्ची के परिजन थाने पहुंचे, तो वहां के इंचार्ज ने गाली-गलौज करके भगा दिया। ऐसे में बलात्कारी से कम अपराधी तो वह इंस्पेक्टर भी नहीं माना जाएगा। लेकिन, उसे पता है कि वह वर्दीधारी है। आज सस्पेंड हो गया है। कल बहाल हो जाएगा। उधर, बच्ची से हैवानियत करने वाला बेखौफ घूम रहा होगा। उसे पता है कि पुलिस ज्यादा से ज्यादा क्या करेगी? मामला ही मुश्किल से दर्ज हुआ, तो कार्रवाई का अंदाजा कोई भी लगा सकता है। पुलिस शिकायत को गंभीरता से लेती और समय पर हरकत में आ जाती तो संभव था, नाकेबंदी करके आरोपी को पहचाना या पकड़ा जा सकता था। आला अधिकारियों को चाहिए कि वे निचले अमले को और अधिक संवेदनशील बनाएं। ये बात अपनी जगह वाजिब हो सकती है कि गली-गली में हैवान घूम रहे हों, तो पुलिस भी कितनों को सुरक्षा दे पाएगी? लेकिन यह जरूरी है कि पुलिस पीडि़त पक्ष के दर्द को समझे। अपराधी को कानून की ताकत बताए।