नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी का पूजन अर्चन किया जाता है नव दुर्गा में द्वितीय ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी) दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी को ब्राह्मी कहा है। ब्राह्मी आयु को बढ़ाने वाली स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों को नाश करने के साथ-साथ स्वर को मधुर करने वाली है। ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है, क्योंकि यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है।
भगवान शिव से विवाह हेतु प्रतिज्ञाबद्ध होने के कारण ये ब्रह्मचारिणी कहलाईं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या व चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।
माता का स्वरूप- देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ मे जप की माला है, बाएं हाथ में कमंडल है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप है अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप है। ये देवी भगवती दुर्गा, शिवस्वरूपा, गणेशजननी, नारायनी, विष्णुमाया तथा पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी के नाम से प्रसिद्ध है। माता की संतान ऋक्,यजुष,साम,अथर्वा
(पौत्र:व्याडि,लोकविश्रुत मीमांस,पाणिनी,वररुचि)
ध्यान मंत्र
दधाना कर पद्माभ्यामक्ष माला कमण्डलु | देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||
ब्रह्मचरणी की उपासना साधक कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए भी साधना करते हैं। जिससे उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें।
मां ब्रह्मचारिणी का एक प्रसिद्ध मंदिर वाराणसी के सप्तसागर, कर्णघंटा क्षेत्र में स्थित है। नवरात्रि के नौ दिन में दुर्गा जी के नव स्वरूपों में ब्रह्मचारिणी देवी का स्थान दूसरा है, दूसरे दिन इन्हीं की पूजा की जाती है। वाराणसी में गंगा के किनारे बालाजी घाट पर मां ब्रह्मचारिणी के इस मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भीड़ लग जाती है। इस मंदिर में माता की नारियल, चुनरी, माला फूल आदि चढ़ा कर पूजा की जाती है।
यह वायु विकार और मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है।
अगर किसी को मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति ने ब्रह्मचारिणी की आराधना करना चाहिए। नवरात्रि पर्व के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी का षोडशोपचार पूजन अर्चन करना चाहिए
दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।
माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।
इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।