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कविता-बिखरीं कलियां

कविता

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कविता-बिखरीं कलियां

कविता-बिखरीं कलियां

डॉ. अजिता शर्मा

बाबुल के आंगन की वो नवकलियां
हंसती-खेलतीं मुस्कराती वो कलियां ॥
जिन पर माता-पिता का साया ऐसा
जैसे फूलों पर हो ठंडी छैयां॥

संस्कारों और संस्कृतियों से भरा जीवन
जैसे हों उनकी अनमोल दुनिया ॥
लेकिन नियति के कू्रर हाथों से
अभावों में बिखरीं वो कलियां॥

पर एक दूसरे का संबल बनी वो कलियां
माता-पिता के बिना अपनी अनुजों की
प्रेरणा बनी वो कलियां ॥
जीवन की ठोकरें खा कर
सम्भाला एक दूसरे को
जमाने को समझाने,उससे लडऩे का
दम भरती थी वो कलियां ॥अपने अपने आंगन की जिम्मेदारियों
को बख़ूबी निभाती थी वो कलियां ॥

बाबुल के आंगन से दूर हो के भी
मन से सदैव जुड़ी रहती थीं वो कलियां ॥

दूर होकर भी जिनका मन बसता था
बाबुल के आंगन में
जो रहती थी अपनों की सेवा में ॥
पर जिनका मन अटका रहता था
भाई की अनमोल मुस्कराहट में

जो था उनका दुलारा,माता पिता का प्यारा
बेबसी में भी हमेशा सभी को
खुश करने में लगी रहीं वो कलियां ॥
लेकिन कहीं न कहीं अंदर से टूटी सी वो कलियां
बिखरीं थी वो कलियां ॥

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