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कविता-होली का मजा कुछ और है

कविता

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होली का मजा कुछ और है

होली का मजा कुछ और है

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

पर्व होली को मनाने का मजा कुछ और है ।
रंग से रंगने रंगाने का मजा कुछ और है ।।1

जब छुड़ाएं मैल मन का ज्ञान का उबटन लगा,
स्वस्थ मन से खिलखिलाने का मजा कुछ और है। 2

फूल टेसू के रंगीले हर किसी को भा रहे,
रंग केसर सा चढ़ाने का मजा कुछ और है।3

झाांझा-मंजीरे बजे खड़ताल-ढोलक संग में,
जोश में भर फाग गाने का मजा कुछ और है। 4

गाल हर कर दें गुलाबी अनछुए जो दिख रहे,
रंग हर तन पर लगाने का मजा कुछ और है। 5

मार पिचकारी भिगो दें रंग से हर चूनरें,
इंद्रधनुषी सा बनाने का मजा कुछ और है। 6

भंग-ठंडाई तरंगित जो पिये उसको करें,
मस्त हो गाने-बजाने का मजा कुछ और है।7

गृहणियां हर घर सजातीं थाल पापड़-चिप्स के,
संग गुझिाया भी खिलाने का मजा कुछ और है। 8

भाव समता का जगे जब रंग होली का चढ़े,
बैर आपस के भुलाने का मजा कुछ और है। 9

फाल्गुन पर पढि़ए कविता

जब से आया है फागुन
वसीम अहमद नगरामी

मस्त मल्हारें गाए मन।
जब से आया है फागुन।।
पोर-पोर में जगी अगन,
जब से आया है फागुन।
सजे-धजे हैं घर-आंगन,
जब से आया है फागुन।
मस्त-मस्त है जनजीवन,
जब से आया है फागुन।
फूला नहीं समाए मन,
जब से आया है फागुन।
मन ही मन बतियाए मन,
जब से आया है फागुन।
कुछ भी नहीं छिपाए मन,
जब से आया है फागुन।
झाूमे तन-इतराए मन,
जब से आया है फागुन।
मन में नहीं समाए मन,
जब से आया है फागुन।
देवर बन-बन जाए मन,
जब से आया है फागुन।
पुनि-पुनि देख रहा दर्पन,
जब से आया है फागुन।
विहंसा है उपवन-उपवन,
जब से आया है फागुन।
कलियां करती आलिंगन,
जब से आया है फागुन।
टेसू पर छाया यौवन,
जब से आया है फागुन।