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पृथ्वीराज चौहान ने अजमेर को दी सांस्कृतिक विरासत

शनिवार को मनाई जाएगी पृथ्वीराज चौहान जयंती

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पृथ्वीराज चौहान जयंती

अजमेर और दिल्ली पर राज करने वाले भारत के अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) न केवल एक योद्धा और कुशल सेनानायक थे वरन् बहुभाषा और कलाओं के भी मर्मज्ञ थे। उन्होंने अजमेर को अनेक सांस्कृतिक विरासतों से समृद्ध किया। गुरू रामपुरोहित से शिक्षा प्राप्त करने वाले पृथ्वीराज संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रष आदि छह भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने गणित, वाणिज्य का भी अध्ययन किया। वे युद्धकौशल, शस्त्रविद्या, कुश्ती आदि के साथ-साथ संगीत, चित्रकला और कविता इत्यादि कलाओं में भी पारंगत थे। दरबार में विद्वानों का शास्त्रार्थ हुआ करता था और पृथ्वीराज उसमें निर्णायक की भूमिका का निर्वहन करते थे। एक बार जैन विद्वान जिनपति सूरी और पद्मप्रभा में शास्त्रार्थ हूुआ और सूरी विजयी हुए, तब स्वयं पृथ्वीराज ने हाथी पर सवार होकर सूरी के निवास पर जाकर विजय पत्र भेंट कर सम्मानित किया। यह पृथ्वीराज की विद्वता और साधकों के प्रति सम्मानभाव का परिचायक है।

पृथ्वीराज चौहान जयंती

पृथ्वीराज विजय के अनुसार पृथ्वीराज रोज प्रात: नगरखाने में शहनाई की मधुर ध्वनि के साथ उठकर सर्वप्रथम कपिला गाय के दर्शन कर प्रणाम किया करते थे। पूजा-ध्यान की प्रात:कालीन वेला में अजमेर की गलियों में वेदमंत्रों की ध्वनि गूँजायमान होती थी। प्रत्येक घर में यज्ञषाला व अग्निहोत्र होता था। बालकों को षिक्षित करने वाले षिक्षा केन्द्र भीनमाल में 45 हजार ब्राह्मण निवास करते थे, जो पुराण, आयुद, नाट्यर्वेषास्त्र, ज्योतिष आदि सभी विधाओं में विज्ञ थे।

पृथ्वीराज चौहान जयंती

पृथ्वीराज की सभा में कवि चन्दबरदाई के अलावा कश्मीर के जयानक और विद्यापति गौड़, जनार्दन, विष्वरूपा और बागेष्वर जैसे विद्वान भी थे। उनके मित्र के रूप में परिचित चन्दबरदाई ने लोकप्रिय ग्रंथ 'पृथ्वीराज रासो' और कवि जयानक ने महाकाव्य 'पृथ्वीराज विजय' की रचना की, यह संस्कृत में है। ये दोनों ग्रंथ राजस्थानी की साहित्यिक धरोहर हैं। उस समय संस्कृत भाषा ही सम्पूर्ण भारत में विद्वानों की भाषा थी। महल में पृथक चित्रशाला बनी हुई थी। चित्रकारों और नृत्यांगनाओं को भी पृथ्वीराज की सभा में बहुत सम्मान मिला करता था। तब आषु कवियों का बहुत बोलबाला था, खडिय़ा से तख्ती पर रचना लिखकर फि र उसे सुनाने की प्रथा प्रचलित थी। विजेताओं को 'जय-पत्र' दिया जाता था।

पृथ्वीराज चौहान जयंती

हिन्दुओ ने हमेशा युद्ध के नियमो के अनुसार सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले दिन में लड़ाई का पालन किया लेकिन बुज्दिल मुस्लिम शाशकों ने सदैव रात्री को ही आक्रमण किया जब हिन्दू राजा और सैनिक उनके सैनिको के घावो का उपचार कर रहे होते है | मुहम्मद गौरी ने भी रात को अचानक आक्रमण कर दिया और उसके मंत्रियों ने जयचंद से मदद की गुहार की लेकिन जयचंद ने इसका तिरस्कार करते हुए मदद करने से मना कर दिया |निडर पृथ्वीराज ने भटिंडा की तरफ अपनी सेना भेजी और 1191 में प्राचीन शहर थानेसर के निकट तराइन नामक जगह पर उसके शत्रुओ से सामना हुआ | जिद्दी राजपूतो के आक्रमण की बदोलत पृथ्वीराज ने विजय प्राप्त की और मुस्लिम सेना मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज के समक्ष छोडकर रण से भाग गयी | मुहम्मद गौरी को बेडियो में बांधकर पृथ्वीराज की राजधानी पिथोरगढ़ लाया गया और उसने पृथ्वीराज के समक्ष दया की भीख माँगी | मुहम्मद गौरी ने घुटनों के बल बैठकर उसकी शक्ति की तुलना अल्लाह से करी | भारत के वैदिक नियमो के अनुसार पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को क्षमा कर दिया क्योंकि वो एक पड़ोसी राज्य का ना होकर एक विदेशी घुसपैठिया था | बहादुर राजपूत पृथ्वीराज ने सम्मानपूर्वक मुहम्मद गौरी को रिहा कर दिया |