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मम्मी-पापा से दूर, मुम्बई के अस्पताल में सबके साथ रहती है रिद्धि और सिद्धि टवींस

मुम्बई के सरकारी वाडिया हॉस्पिटल में रहनी वाली रिद्धि-सिद्धि रेयरेस्ट टवींस हैं, लेकिन यह एक विडंबना ही है कि जन्म के तीन साल बाद भी उनका कोई स्थायी गार्जियन नहीं है। 

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Dhirendra Kumar Mishra

Oct 23, 2016

Riddhi & Siddhi twins

Riddhi & Siddhi twins

मुम्बई. इसे आप ईश्वर की विडंबना कह सकते हैं कि एक मजदूर और गरीब माता-पिता की आस भी वो पूरी न करें। ऊपर से गरीब मजदूर घर ऐसे रेयर टवींस को भेज दें, जो ईचियोफैगस टेट्रापस टवींस हो। ऐसा ही एक मामला तीन साल पहले मुम्बई स्थित बाई जरबाई वाडिया हॉस्पिटल में हुआ। उसके बाद से ही ट्वींस के माता-पिता उनसे दूर हो गए। तब से लेकर अभी तक ट्वींस रिद्धि और सिद्धि का घर भी वाडिया हॉस्पिटल ही है, लेकिन उसके तकदीर में क्या लिखा इसका आभास किसी को नहीं है।



गायकर को ही मम्मा मानती हैं रिद्धि-सिद्धि
वाडिया हॉस्पिटल के सीईओ ऑफिस के पास अधिकांश समय उछल-कूद करने वाली रिद्धि-सिद्धि मम्मा अब वहां सभी नर्से और आया हैं। लेकिन जब भी वो मम्मा कहकर किसी को बुलाती हैं, तो सभी समझ जाते हैं कि वह शोभा गायकर को बुलाती है, क्योंकि वह दोनों से सबसे ज्यादा जुड़ी हैं। एनजीओ प्रथम के प्रयास से गायकर हॉस्पिटल में दोनों की देखभाल करती है। आया मनीषा भी पार्ट टाईम केयरटेकर हंै। गायकर कहती हैं, मेरा अपना भी दो बच्चा है, लेकिन अब मैं रिद्धि-सिद्धि से भी उसी तरह जुड़ गई हूं, जैसा कि अपने बच्चों से। जरूरी काम से छुट्टी पर होने की वजह से मैं दोनों को बहुत मिस करती हूं। ऐसा लगता है, जैसेकि मैं अपने बच्चे को मिस कर रही हूं।



स्वीपर से सर्जन तक का है जुड़ाव
हॉस्पिटल के सीईओ मिन्नी बोधनवाला भी दोनों का ख्याल रखते हैं। उनके टेबल पर एक बाउल में हमेशा टॉफी व चॉकलेट भरा रहता है। इसके अलावा भी वह दोनों को खाने की जरूरी सामान लाकर देते रहते हैं। वह कहते हैं कि वैसे तो इनके रहने के लिए वार्ड 21 के अंत में एक कलरफुल क्यूबिकल कमरा है। यह जानवरों के सर्जरी वाले हिस्से के साथ है, लेकिन दिन में ज्यादातर समय उनके सामने ही ये बच्चे खेलते रहते हैं। उन्होंने कहा कि इस अस्पताल में स्वीपर से लेकर सर्जन तक दोनों से जुड़ाव रखते हैं। उन्होंने इस बात की भी जनकारी दी कि करीब डेढ़ साल पहले उसके माता-पिता एक बार मिलने आये थे। उसके बाद से फिर कभी नहीं आये।




गोद लेने के लिए तैयार हैं कई दंपत्ति
सीईओ बोधनवाला कहते हैं कि उनके पास ऐसे दंपत्तियों के फोन आते रहते हैं, जो इन्हें गोद लेना चाहते हैं। लेकिन मैं अभिभावकों के सहमति के बगैर उन्हें गोद नहीं दे सकता। नियमों के अनुसार इसके लिए उनकी सहमति जरूरी है। मैं उन दोनों को अलग कैसे करूं। उनके माता-पिता को ढूंढने का प्रयास जारी है। मिलने पर सहमति लेने का भी प्रयास करूंगा।



अजीबोगरीब ट्वींस हैं रिद्धि-सिद्धि
अस्पताल के सीईओ बताते हैं, दोनों अजीबोगरीब टवींस हैं। इस तरह के टवींस को मेडिकल साइंस की भाषा में ईचियोफैगस टेट्रापस टवींस कहते हैं। वे जन्म के समय से ही न केवल आपस में जुड़े हैं, बल्कि उनका यूरिनल, पेट और जननांग भी आपस में जुड़ा हुआ था, जिसे 10 मई 2013 को डाक्टरों ने छह घंटे की कठिन सर्जरी के बाद अलग कर दिया। ऐसे ट्वींस बच्चे 50,000 में से केवल एक ही होते हैं। भारत में अभी इस तरह के दो ही बच्चे हैं, जिनमें से एक ये टवींस भी हैं।



दीवाली के बाद जाएंगी स्कूल
एनजीओ प्रथम के नवनाथ काम्बले कहते हैं कि बच्चियों के माता-पिता को संपर्क करने का कई बार प्रयास किया गया। बर्थ सर्टिफिकेट के लिए उनकी जरूरत पड़ी थी। काम्बले ने बताया कि वो कहते हैं मैं आऊंगा, पर कभी नहीं आते। अंतत: कोर्ट से एफिडेविट बनवाकर दोनों का बीएमसी के स्कूल में एडमिशन करवाया है। उनकी एक समस्या का समाधान हो गया है। उनका एडमिशन बीएमसी संचालित पाइबवाडी हिंदी स्कूल परेल में करा दिया गया है। अब दीवाली के बाद दोनों क्लास ज्वाईन करेंगी।



छह मई को पैदा हुई
6 मई, 2013 को सुबह तीन बजे दोनों का वाडिया ऑस्पिटल में जन्म हुआ। उस समय 26 वर्षीय शालू अपनी सास शोभा ताई के साथ आई थी और प्रि-मैच्योर टवींस को जन्म दी थी। वे लोग ओलावा गांव, रायगढ़, महाराष्ट्र के रहने वाले हैं। वहीं पर एक मलिन बस्ती में उनका एक कमरे का घर है। शालू के पति 32 वर्षीय अरुण पवार की एक तीन साल की बेटी पहले से ही है। उसके बाद एक बेटी और हुई जो कुछ दिनों बाद मर गई। शालू और अरुण को इस बार बेटे की आस थी, लेकिन ऊपर वाले की मर्जी कुछ और थी। उन्होंने लड़की दिया, वो भी ईचियोफैगस टेट्रापस टवींस, जो दुनिया में रेयर ही होते हैं। अरुण ने जन्म के तत्काल बाद कहा था हमने इस बात की ऊपर वाले से अपेक्षा नहीं की थी। वह एक प्रवासी मजदूर है।



आपरेशन पर खर्च हुआ 20 लाख रुपये
हॉस्पिटल प्रशासन का कहना है कि जन्म के बाद उसके माता-पिता उसे यहीं छोड़कर चले गए। उसके बाद से हॉस्पिटल प्रशासन और एनजीओ प्रथम के द्वारा दोनों की देखभाल जारी है। सीईओ बोधनवाल का कहना है कि आपरेशन पर 20 लाख रुपये खर्च हुआ। इस खर्च को दानदाताओं के जरिये वहन किया गया। सीईओ को अब इस बात की भी चिंता सताने लगी है कि मेरा तो आज न कल यहां से ट्रांसफर हो जाएगा। उसके बाद इन बच्चों का क्या होगा, हमे नहीं पता!