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143 साल पुराने ब्रिटिशकालीन चर्च की निखरेगी आभा, संरक्षित स्मारकों की लिस्ट में शामिल करने की तैयारी

यदि सब कुछ योजनानुसार आगे बढ़ा तो 143 वर्ष से अधिक पुराने ब्रिटिशकालीन चर्च की खोई हुई ऐतिहासिक आभा फिर से लौट सकती है।

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दौसा

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Anil Prajapat

Feb 02, 2026

church in Bandikui

ब्रिटिशकालीन ऐतिहासिक सेंट जॉन बैपटिस्ट चर्च। फोटो: पत्रिका

बांदीकुई। यदि सब कुछ योजनानुसार आगे बढ़ा तो रेलवे कॉलोनी स्थित 143 वर्ष से अधिक पुराने ब्रिटिशकालीन ऐतिहासिक सेंट जॉन बैपटिस्ट चर्च (प्रोटेस्टेंट) की खोई हुई ऐतिहासिक आभा फिर से लौट सकती है। पुरातत्व विभाग द्वारा चर्च को संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है।

विभाग की ओर से रेलवे से अनापत्ति प्रमाण पत्र मांगा गया था, जिस पर अब उत्तर-पश्चिम रेलवे ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए पुरातत्व विभाग के साथ एमओयू साइन करने की तैयारी शुरू कर दी है।

राजस्थान में पहली रेलगाड़ी अप्रैल 1874 में आगरा से बांदीकुई के बीच चली थी। इसी रेलवे विस्तार के दौरान वर्ष 1883 में सेंट जॉन बैपटिस्ट चर्च का निर्माण हुआ, जो ब्रिटिशकालीन गोथिक वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। नुकीली मेहराबें, ऊंचाई की ओर जाती संरचना और धार्मिक प्रतीक इस चर्च को विशिष्ट पहचान देते हैं। समय के साथ नियमित रखरखाव के अभाव में चर्च की स्थिति जर्जर हो गई है।

पुरातत्व विभाग ने रेलवे से मांगी थी एनओसी

पुरातत्व विभाग की विशेषज्ञ समिति ने वर्ष 2024 में चर्च का निरीक्षण कर इसकी ऐतिहासिक और कलात्मक महत्ता को रेखांकित करते हुए विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके आधार पर प्रमुख शासन सचिव ने रेलवे को पत्र भेजकर संरक्षित स्मारक घोषित करने के लिए एनओसी देने का आग्रह किया। प्रकरण पर विचार के बाद रेलवे स्तर पर सैद्धांतिक सहमति बन गई है। शर्त यह रहेगी कि भवन में केवल संरक्षण से जुड़े कार्य ही किए जाएंगे। इसी के तहत उत्तर-पश्चिम रेलवे द्वारा एमओयू का प्रारूप तैयार किया जा रहा है, जिसे शीघ्र पुरातत्व विभाग को भेजा जाएगा।

गोथिक शैली में निर्मित चर्च

गोथिक शैली में निर्मित इस चर्च की खिड़कियों में लगे बेल्जियम ग्लास, सागवान की लकड़ी से बनी छत, मार्बल के फूलदान और तड़ित चालक वर्तमान में क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं। संरक्षण के बाद यह धरोहर न केवल ऐतिहासिक पहचान को सहेजेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण विरासत बनेगी।

टॉपिक एक्सपर्ट

वर्ष 1869 में अंग्रेजों का यहां आगमन शुरू हुआ। भारत के वायसराय लॉर्ड मेयो 1 अक्टूबर 1870 को आगरा से अजमेर जाते समय बांदीकुई पहुंचे थे। स्थानीय अधिकारियों की मांग पर उन्होंने यहां एक बड़े प्रार्थना स्थल के निर्माण की घोषणा की। इसके बाद 15 अक्टूबर को लॉर्ड मेयो हॉस्पिटल (महिला चिकित्सालय, सांगानेरी गेट) और 22 अक्टूबर को लॉर्ड मेयो कॉलेज अजमेर की भी घोषणा की गई।
रामदयाल शर्मा, रिटायर्ड लाइब्रेरियन आयोजना विभाग, जयपुर

भारत सरकार की ओर से संरक्षण कार्य के लिए अनुमति संबंधी स्वीकृति मिल गई है। इसके आधार पर एमओयू का प्रारूप तैयार किया जा रहा है, जिसे शीघ्र पुरातत्व विभाग को भेजा जाएगा।
रवि जैन, मण्डल रेल प्रबंधक, जयपुर

चर्च के संरक्षण के लिए रेलवे से एनओसी मांगी गई थी। अनुमति मिलने के बाद चर्च को संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल कर संरक्षण कार्य कराया जा सकेगा।
पंकज धरेन्द्र, निदेशक पुरातत्व विभाग, जयपुर

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