
अजमेर में ऋषि घाटी मार्ग पर मुड्ढे व सरकंड़ों के सोफे तैयार करते कारीगर।
दिनेश कुमार शर्मा
अजमेर (Ajmer news). शहर में मुड्ढे-मुड्ढियों की दशकों पुरानी ‘कारीगरी’ बदस्तूर जारी है। इससे आज भी करीब एक हजार लोगों को रोजगार मिल रहा है। शहर में 25 दुकानों पर 150 से अधिक कारीगर कार्यरत हैं, जबकि 400 से अधिक महिलाएं घरों में इन पारंपरिक उत्पादों को तैयार करने में जुटी हैं। इन मुड्ढे-मुड्ढियों की डिमांड देश के कई राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी है। पुष्कर के टेक्सटाइल और हैंडीक्राफ्ट्स के साथ अजमेर के पारंपरिक मडढे-मुडढी भी निर्यात किए जाते हैं।
व्यापारियों के अनुसार बाजार में मुड्ढियों की रोजाना 70 से 100 और मुड्ढों के 40 से 50 नग की बिक्री हो रही है। उन्होंने बताया कि कच्चे माल की मजदूरी मुड्ढी के लिए 100 और मुड्ढे के लिए 450 रुपए पड़ती है। मुड्ढी की कुल लागत 375 रुपए आती है, जिसे बाजार में 400 रुपए में बेचा जा रहा है। इससे प्रति नग करीब 25 रुपए मुनाफा मिलता है। मुड्ढे की लागत लगभग 1100 रुपए आती है। यह 1200 रुपए में बिकता है, जिससे प्रति मुड्ढा करीब 100 रुपए का मुनाफा होता है। कम मुनाफे के बावजूद इस पारंपरिक व्यवसाय ने न केवल कारीगरों को आजीविका दी है, बल्कि अजमेर की इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है। अब बांस की चिक व परदों की भी डिमांड है। यह कपड़े सहित करीब 30 रुपए वर्गफीट बिकती है, जिसमें एक तरफ नेट लगी होती है।
कारीगरों के अनुसार सरकंडा 40 साल पहले एक मण 100 रुपए में मिलता था, जो अब 2000 रुपए मण हो गया है। पन्नी घास 5 रुपए किलो से बढ़कर 30 रुपए, मूंझ बाण 50 से 150 रुपए किलो, नायलॉन रस्सी 70 से 150 रुपए किलो, पुराने टायर 5 से बढ़कर 15 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं। रेक्सीन 20 से बढ़कर 80 रुपए मीटर तथा धागे 70 से बढ़कर 175 रुपए किलो हो गए हैं।
पहले मुड्ढी की मजदूरी 10 रुपए और मुड्ढा 40 रुपए थी, जबकि अब मुड्ढी 100 और मुड्ढा की 350 रुपए तक है। वर्ष 1985 में मुड्ढा 85 रुपए, वर्ष 2000 में 250 रुपए और अब 1200 रुपए का बिक रहा है। मुड्ढी 1985 में 40 रुपए, वर्ष 2000 में 100 रुपए, अब नायलॉन 300 रुपए व मूंझ रस्सी वाली 400 रुपए में उपलब्ध है। अजमेर से गुजरात के अहमदाबाद, बडौदा, मध्यप्रदेश के इंदौर, मंदसौर, रतलाम, जावरा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि प्रांतों व विदेश में ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड और ब्रिटेन तक माल भेजा जा रहा है।
पुष्कर, रूपनगढ़, किशनगढ़, नसीराबाद, परबतसर, मूंडवा, डीडवाना, नागौर, कुचामन, डेगाना, जयपुर, उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर, पाली, मारवाड़, जैसलमेर, डूंगरपुर, श्रीगंगानगर, झुंझुनूं, नवलगढ़, हनुमानगढ़, सवाईमाधोपुर, देवली, कोटा, बूंदी आदि।
सरकार को मुफ्त या फिर रियायती दर पर जमीन उपलब्ध करानी चाहिए, जिससे गोदाम बनाया जा सके। सीजन में सामान खरीदकर रखने की जगह नहीं होती और बरसात में इसके भीगकर खराब होने का अंदेशा रहता है। यह हस्तकला है। इसके कारीगरों को अनुदान और रियायत के साथ कर्ज मिलना चाहिए, जिससे इससे जुड़े लोगों को प्रोत्साहन मिल सके।
ओमप्रकाश यादव, अध्यक्ष, यादव-जाटव भरतपुरियान पंचायत समिति यादव शिव मंदिर गंज, अजमेर
Published on:
05 Apr 2026 11:07 pm
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