राजस्थान के टोंक जिले के पारली गांव में आंखों पर कपड़े से पट्टी बंधे बैल का कोल्हू को लगातार चलाना और तिलों से तेल का निकलना, ऐसी तस्वीर आज भी देखी जा सकती है।
यहां कोल्हू घाणी के संचालक हनुमान साहू अपने पुरखों के धंधे को सहजे हुए है। सर्दी में तिल के तेल की मांग बढ़ने से घाणियां शुरू हो गई। घाणी संचालक ने बताया कि कोल्हू की घाणी उनके पूर्वजों के समय से ही चलती आ रही है। आस-पास के गांवों के ज्यादातर लोग कोल्हू की घाणी का तेल खाना पसंद करते हैं।
इस बार तिल का तेल 350 रुपए प्रति किलो के भाव से बिक रहा है। तिल के भाव बढ़ने से तेल महंगा हो गया है। 10 किलो तिल में करीब साढ़े चार किलो तेल निकलता है। इस तेल को निकालने में लगभग तीन घण्टे का समय लग जाता है। सर्दी के मौसम में तिल का तेल आमजन की पहली पसंद बन गया है।
अब तीखी सर्दी का दौर शुरू हो गया है। इन दिनों बाजरे के स्वादिष्ट व्यंजन थाली की शोभा बन रहे है। तिल के व्यंजनों की भी बहार है। तिल न केवल खाने में स्वादिष्ट होते है,बल्कि सेहतमंद भी होते हैं। सर्दी के मौसम में तिल का तेल बाजरे की रोटी व खिचड़ी के साथ खूब खाया जाता है।
खासकर ग्रामीण क्षेत्र में तो लोग इसे बड़े चाव से खाते है। कोल्हू की घाणी से निकले तिल के तेल की मांग अधिक रहती है। ऐसे निकालते है तेल: बेलों से चलने वाले कोल्हू के माध्यम से तेल निकालने की यह प्रक्रिया सदियों पुरानी है। इसमें बेल को कोल्हू में जोत दिया जाता है और एक निश्चित जगह में बेल घूमा करता है।
कोल्हू चलने के दौरान बैल की आंखों पर कपड़े की पट्टी बांधी जाती है ताकि उसे गोल घूमने पर चक्कर ना आ जाए। कपड़े के कारण बेल को सीधा सड़क पर चलने का एहसास होता है।
बैल से लकड़ी का एक मोटा तना बंधा होता है, जिसके घूमने पर तिलों पर प्रेशर पड़ता और उनमें से तेल बाहर निकलकर नीचे बनी होदी में जमा होता है। साथ ही तिल की खल बाहर को निकाल लिया जाता है। यह खल पशुओं को खिलाने के काम आती है।