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जीवन की मीठी चुभन ही लिखने की प्रेरणा देती है: डॉ. महेन्द्र भानावत

डॉ: भानावत ने देश के विविध भागों की लोकधर्मी कला-संस्कृतिपरक समृद्ध सम्पदा से भारतीयता को अनूठी पहचान दी। डॉ. रजनी कुलश्रेष्ठ ने उनसे बातचीत की...

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डॉ. महेन्द्र भानावत

dr mahendra bhanavat

लोककलाओं के सशक्तिकरण के लिए अब तक क्या प्रयास किए गए हैं?
1968 में भारतीय लोककला मंडल के माध्यम से देवीलाल सामर के सान्निध्य में हमने पहला लोकानुरंजन मेला प्रारंभ किया। उसके बाद 1978, 1979 और 1981 में लगातार ऐसे मेले आयोजित किए गए। इन मेलों का प्रभाव यह रहा कि पूरे देश में लोकानुरंजन के माध्यमों में नई जीवनी-शक्ति का संचार हुआ। कलाकारों के दल हमारे यहां आने के लिए उमड़ पड़े। लोककलात्मक विमर्श और चिंतन मनन के लिए विद्वानों की संगोष्ठियां शुरू कीं। पाठ्यक्रमों में इन विधाओं को स्थान मिला। खड़ताल वादक सद्दीक, मांड गायिका अल्लाजिलाईबाई, पड़ निर्माता श्रीलाल जोशी तथा मोलेला के माटी की प्रतिमाएं बनाने वाले मोहनलाल कुम्हार पद्मश्री से सम्मानित हुए। इससे भी महत्वपूर्ण कार्य उदयपुर के पास बेदला गांव में सन् 1958 में पहलीबार हमने लोककलाकारों के चार शिविर आयोजित किए। इनमें राजस्थान के हर अंचल के लोक गायक, वादक, नर्तक तथा मनोरंजन प्रदायक कलाकारों से हमारा जमीनी संपर्क बना। प्रकाशन में पुस्तकें और लोककला तथा रंगायन जैसी पत्रिकाएं प्रारंभ कीं।

लोक और कला इन दोनों की भारतीय जीवन में उपस्थिति को आप कैसे दर्ज करते हैं?
लोक को हमारे यहां विविध रूपों, रंगों और ढंगों में देखा गया है किंतु भारतीयता के संदर्भ में यह लोक ही हमारे देश की असली पहचान है। यही सच्ची आत्मा और शरीर दोनों है। इस दृष्टि से देश की संपूर्ण प्रदर्शनकारी कलाओं का परीक्षण किया जाए तो हमें लगेगा कि सामुदायिक क्षेत्र में केवल वे ही कलाएं रह गई हैं जो संस्कारों, आस्थाओं, परंपराओं और अनुष्ठानों के साथ जुड़ी हैं।

आप लोकसाहित्य और संस्कृति के शोधार्थियों की सदैव मदद करते हैं। इस क्षेत्र में क्या होना चाहिए जो नहीं हो पा रहा है?
लोककला-संस्कृति का सर्वाधिक अध्ययन राजस्थान में हुआ है। सोचता हूं, हमारे यहां लोककलाओं की एक अकादमी या एक विश्वविद्यालय ही होना चाहिए। जहां तक शोधार्थियों का प्रश्न है, वे मन में उधेड़बुन लिए हुए हैं। लोकजीवन का अध्ययन पुरातत्व, इतिहास, राजनीति, धर्म, दर्शन, अर्थ, समाज, नाट्य, नृतत्व आदि को सांचों-सीखचों में बांट कर नहीं देखता। हमने बहुत सारी चीजें बांट रखी हैं।

नंद चतुर्वेदी ने आपके लिए लिखा है कि आप किसी सिद्धांत, सूत्र, परिपाटी, विशेषज्ञता, महाग्रंथ, आगम-निगम का साक्ष्य नहीं लेते। आपका लेखन उबलते कड़ाहे में हाथ सेकने जैसा है और आप हम सबके बीच एक फिनोमीना ही हैं।
आज जब भारतीय सांस्कृतिक चेतना के आनंद का सौंदर्य अवसाद और अतृप्ति में बदलने लगा है, ऐसे में लोकजीवन के माध्यम से ही उसकी आत्मा में रोशनी फैलानी होगी। मैंने जो लिखा है वह तो उस समुद्र की मात्र छुअन है। जीवन की जो मीठी-चुभन है वही बार-बार लिखने की प्रेरणा देती है। यही सबसे बेहतर जिंदगी को देखने, सुनने, समझने का तरीका है। यही मेरे लेखन का अजस्त्र प्रवाहित स्रोत है।

आपने 150 से अधिक लोकनृत्यों से संबंधित राजस्थान को रंगों का प्रदेश कहा है। इस प्रक्रिया में आपको क्या महसूस हुआ?

सैकड़ों लोकनृत्य देखने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि लोकनृत्य मुख्यत: समूह की रचना हंै। ये सामुदायिक रूप में ही फलते-फूलते एवं फलित होते हैं। जैसे समुद्र में लहरों पर लहरें उठती रहती हैं, विलीन होती रहती हैं। कोई कबीला या जाति नृत्य विहीन नहीं है। पूरी प्रकृति लयबद्ध, रागबद्ध, संगीतबद्ध, समूहबद्ध है। सब थिरक रहे हैं। उसमें फिरकनी सी समूहबद्ध अल्हड़ता है। वहां जड़ भी चेतन लगता है। इन्हीं नृत्यों से प्रेरणा पाकर पं. नेहरू ने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में नृत्योत्सव का शुभारंभ किया।