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बच्चों में बढ़ रहा डाइबिटिज टाइप वन

खान-पान और अनियमित जीवनशैली के कारण डायबिटीज ने अब नौनिहालों को भी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। इसकी बानगी है कि अस्पतालों सहित चिकित्सकों के पास आने वाले बच्चों में भी मधुमेह के लक्षण नजर आ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार डायबिटिज होना सामान्य बात बन रही है लेकिन बच्चों में डायबिटीज टाइप […]

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खान-पान और अनियमित जीवनशैली के कारण डायबिटीज ने अब नौनिहालों को भी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। इसकी बानगी है कि अस्पतालों सहित चिकित्सकों के पास आने वाले बच्चों में भी मधुमेह के लक्षण नजर आ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार डायबिटिज होना सामान्य बात बन रही है लेकिन बच्चों में डायबिटीज टाइप वन के लक्षण नजर आना चिंताजनक है। चिकित्सा विभाग के अनुसार जिले में करवाए गए सर्वे के अनुसार करीब 18 हजार से ज्यादा बच्चे डायबिटिज टाइप वन से ग्रसित मिले। समय पर इंसुलिन की दवा लेने और नियमित जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी के दुष्प्रभाव कम किए जा सकते हैं।

इस कारण होती है

डायबिटिज टाइप वन चिकित्सकों के अनुसार डायबिटिज टाइप वन ऑटो इम्यून डीजिज है। इसमें शरीर में इंसुलिन बनना ही बंद हो जाता है। जबकि डायबिटीज टाइप टू में इंसुलिन तो बनता है लेकिन शरीर की जरूरत की तुलना में कम बनता है। टाइप वन के मरीज मरीज को पूरी उम्र इंसुलिन पर ही निर्भर रहना पड़ता है। बच्चों में डायबिटीज के लक्षण देरी से नजर आने के कारण अचानक शुगर लेवल डाउन हो जाता है और मरीज कोमा में चला जाता है। जिससे उसकी जान जाने का खतरा बढ़ जाता है।

बेहोश होने के बाद आते हैं मरीज

टाइप वन के मरीज चिकित्सक के पास देरी से पहुंच जाते है। ज्यादातर बच्चे जब आते है, जब वह अचानक बेहोश होने लगते हैं। यह बहुत खराब स्थिति होती है। इसे डायबिटीक कीटो एसिडोसिस कहा जाता है। टाइप वन के लक्षणों में बच्चे को बार-बार बहुत ज्यादा प्यास लगना और पेशाब आना, भूख लगना, वजन कम होना, पेट दर्द, उल्टियां, सांस लेने में परेशानी होने लगती है।

इनका कहना है

टाइप वन डायबिटीज के मरीज चिकित्सकों के पास देरी से पहुंचते है। सही समय पर शुगर की जांच और सही तरीके से इंसुलिन लिया जाए तो मरीज सालों तक सामान्य जीवन जी सकता है।

डॉ. रामनिवास बिजारणिया, फिजिशियन सीकर