
अलवर. जिले में पानी का संकट घरों के बाद अब खेतों तक पहुंच गया है। इसके चलते कपास की बुवाई का रकबा घट गया है। कृषि विभाग ने 20 हजार हैक्टेयर का लक्ष्य रखा था, लेकिन पानी की कमी के चलते केवल 6 हजार हैक्टेयर में ही बुवाई की गई है। जबकि पिछले साल जिले की सभी तहसीलों में 26 हजार 961 हैक्टेयर में कपास की फसल हुई थी। उधर, पानी की कमी से हरे चारे का भी संकट हो गया है। जिले में 20 हजार के मुकाबले केवल 3100 हैक्टेयर में ही चारा उगाया गया था जो पशुधन को कम पड़ रहा है।
ज्वार-बाजरा की खेती पर पानी की कमी का रहेगा असर
हर साल खरीफ सीजन में बुवाई करने के बाद ज्वार-बाजरा और कपास की खेती प्रभावित होती है। क्योंकि इन फसलों को आवश्यकता के अनुसार पानी नहीं मिल पाता है। किसानों के पास सिंचाई के लिए इतना पानी नहीं होता है कि खरीफ फसल में पानी दे सके। ये फसल केवल बारिश पर निर्भर करती है। पानी की कमी से पैदा होने वाली फसल की गुणवत्ता सही नहीं होती है। इससे किसानों को बाजार में उचित दाम नहीं मिल पाते हैं ।
हर साल एक मीटर गिर रहा है पानी का स्तर
जिले के कई क्षेत्रों में पानी का स्तर 800 से एक हजार फीट से ज्यादा गहराई पर पहुंच गया है। ऐसे में नलकूपों से सिंचाई करना कठिन हो रहा है। भू-वैज्ञानिक कैलाश शर्मा ने बताया कि प्रत्येक वर्ष अलवर जिले का भूजल एक मीटर गिरता जा रहा है। 2020 के बाद बोरिंग करने की अनुमति मिलने के बाद पिछले चार सालों में 10 गुणा से अधिक बोरिंग हो चुकी है। इससे पानी का दोहन हो रहा है। पानी का रिचार्ज नहीं होने से समस्या बढ़ रही है।
कपास बुवाई का लक्ष्य नए जिलों के अनुसार होना चाहिए था, लेकिन लक्ष्य अधिक दिया गया है। भूजल का स्तर गिरने से किसानों का कपास की खेती से मोहभंग होने लगा है। इससे किसानों में कपास बुवाई में रुचि कम दिखाई है।
पीसी मीणा, संयुक्त निदेशक कृषि विभाग, अलवर
Published on:
16 Jun 2024 06:10 pm
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