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छोटे अपराध पर मिलेगी सामुदायिक सेवा

- नए कानूनी पहलुओं पर न्यायिक अधिकारियों, अधिवक्ताओ और न्याय मित्रों की संयुक्त कार्यशाला आयोजित छोटे अपराध पर मिलेगी सामुदायिक सेवा

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श्रीगंगानगर। पूरे देश में एक जुलाई से लागू हो रहे भारतीय कानून संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता तीनों नए कानूनों में आने वाले कानूनी अड़चनों और संशयों को दूर करने के लिए जिला मुख्यालय पर कलक्ट्रेट सभागार में न्यायिक अधिकारियों, अधिवक्ताओ और न्याय मित्रों की संयुक्त कार्यशाला के दूसरे दिन रविवार को कई अहम कानून पहलूओं पर गहन चर्चा हुई। छोटी चोरी या छोटे अपराध के लिए सजा के रूप में 'सामुदायिकसेवा' की सजा का नया प्रावधान किया गया हैंं। वहीं अब तक कानून में महिला और पुरुष दोनों के लिए अलग अलग अधिकार या कानून थे, इसमें अब इसे अधिक परिभाषित करते हुए ट्रांसजेंडर को शामिल किया गया है। वहीं अब व्यभिचार, समलैंगिक यौन संबंध और आत्महत्या के प्रयास को अपराध नहीं माना जाएगा।

इन अ​धिकारियों ने दिए अपने तर्क

इस दौरान जिला एवं सत्र न्यायाधीश आलोक सुरोलिया, पोक्सो कोर्ट संख्या एक के स्पेशल जज सुरेन्द्र खरे, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव एडीजे गजेन्द्र सिंह तेनगुरिया, लेबर कोर्ट के जज अशोक चौधरी ने कानूनी पहलुओं के बारे में बताया। वहीं अधिवक्ता भुवनेशचन्द्र शर्मा ने आपराधिक विधि में किए गए बदलाव के बारे में तर्क प्रस्तुत किए। अधिवक्ता खुर्शीद आलम खान ने जमानत याचिका के संबंध में विस्तृत चर्चा की। चीफ डिफेंस कौसिंल के रोहताश यादव ने इलैक्ट्रॉनिक्स साक्ष्य, सहायक डिफेंस कौसिलनरपेन कम्बोज ने साक्ष्य के नए स्वरूप के बारे में अपनी बात रखी।

खाली पद होने से लंबित प्रकरणों की संख्या बढ़ी

इस दौरान लंबित प्रकरणों के निस्तारण की चर्चा के दौरान बताया गया कि देश में 4 करोड़ 70 लाख प्रकरण लंबित हैं। दस लाख की जनसंख्या पर महज 21 न्यायिक अधिकारी हैं। अधीनस्थ न्यायालयों में 35 प्रतिशत न्यायिक अधिकारियों, न्याय मित्रों और एफएसएल जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों के पद खाली पड़े हैं।

नए कानून में क्या क्या खास

अब तक अदालत आरोपी से पूछताछ करने के लिए पुलिस को अधिकतम चौदह दिन का रिमांड दे सकती थी लेकिन नए कानून में यह प्रावधान गौण कर दिया गया हैं। यह रिमांड अवधि चालीस से साठ दिन तक हो सकती हैं, इस स्पष्ट उल्लेख नहीं किया हैं। इसी प्रकार अदालत अब आरोपी के खिलाफ प्रसंज्ञान लेने के लिए मेल या संचार के अन्य माध्यम इस्तेमाल कर सकती हैं, पहले आरोपी को स्वयं को कोर्ट में पेश करना जरूरी था। वहीं ईमेल या जीरो नम्बरीएफआइआर दर्ज हो जाएगी लेकिन इसे नियमित एफआइआर के लिए पीडि़त पक्ष को संबंधित पुलिस थाने में तीन दिन में पेश होना होगा।

आतंकवाद और मॉबलिंचिंग गंभीर अपराध

न्याय संहिता में संगठित अपराध, आतंकवादी कृत्य, मॉब लिंचिंग, हिट-एंड-रन, धोखे से किसी महिला का यौन शोषण, छीनना, भारत के बाहर उकसाना, भारत की संप्रभुता, अखंडता और एकता को खतरे में डालने वाले कृत्य और झूठी या फर्जी खबरों जैसे 20 नए अपराधों के बारे में उल्लेख किया गया है। इस नए कानून में हार्डकोर अपराधियों पर संबंधित अपराध का आरोप तय करने के लिए अपराधी को कोर्ट में पेश करने की बाध्यता को समाप्त कर दिया गया हैं। इससे जेल से वीडियो क्रॉफ्रेसिंग या मेल के माध्यम से चार्ज लगाने की प्रक्रिया में आसानी रहेगी।

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