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दूधिया हुआ बेहोश तो दूध का शरबत बना गटक गए

-किसान संगठनों के 'गांव बंद' में समाजकंटकों की घुसपैठ से यह आंदोलन अमानवीयता की हदें पार करने लगा है।

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दूधिया हुआ बेहोश तो दूध का शरबत बना गटक गए

श्रीगंगानगर.

किसान संगठनों के 'गांव बंद' में समाजकंटकों की घुसपैठ से यह आंदोलन अमानवीयता की हदें पार करने लगा है। श्रीगंगानगर-हिन्दुमलकोट मार्ग पर शनिवार को किसान संगठनों के तीन पुली पर लगाए नाके पर कुछ एेसा ही मंजर वहां मौजूद लोगों को देखने को मिला। इस नाके पर किसानों के वेश में मौजूद समाजकंटकों ने एक दूध विक्रेता (दूधिये)का दूध छीना तो वह बेहोश हो गया। दूध छीनने वालों ने इसके बाद उसके दूध का शरबत बनाया और उसके आसपास खड़े होकर गटकते रहे। इसी दौरान किसी का ध्यान बेहोश पड़े दूध विक्रेता की तरफ गया तो आसपास से किसी चिकित्सक को बुलाकर उसका उपचार करवाया। जब यह घटना घटी, मौके दर्जनभर पुलिस वाले भी थे। लेकिन न तो किसी ने छीना झपटी का विरोध किया और न ही बेहोश दूधिये की सुध ली।
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांव कोठा का जीतसिंह वर्षों से अपने गांव से दूध लेकर श्रीगंगानगर में घर-घर जाकर बेचता है। लेकिन शनिवार को उसके साथ जो कुछ भी हुआ वैसा आज तक नहीं हुआ। सुबह दस बजे के आसपास क्ंिवटल भर दूध की कैनियों से लदी उसकी मोटरसाइकिल तीन पुली नाके पर पहुंची तो वहां मौजूद युवकों ने उसे घेर लिया। जीतसिंह के साथ उसका जवान बेटा भी था। दोनों ने उन युवकों को घर-परिवार की हालत बताई और दूध ले जाने देने की दुहाई दी। तमाशबीनों की भीड़ के साथ पुलिस भी तमाशबीन बन युवकों और दूधिये के बीच चल रही नोकझोंक को देखती और सुनती रही।
आंसुओं का असर नहीं
इसी दौरान युवकों ने दूधिये का पूरा दूध वहां पड़े खाली बर्तनों में पलटाने का आदेश पारित कर दिया। यह सुनकर दूधिया रोने लगा। उन्मादी युवक उसके दूध को पलटने लगे तो उनके हाथ भी पकड़े और गिड़गिड़ाया भी। लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ। रोजी के लुटने का नजारा दूधिया ज्यादा देर तक नहीं देख पाया और वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा। बेटे ने उसे संभाला और मदद की गुहार लगाई तो एक-दो लोग आगे आए और बेहोश पड़े दूधिये के हाथों और पैरों की मालिश शुरू की। दूधिये की हालत से बेखबर युवकों ने उसके दूध का शरबत बनाया और गटकने लगे। किसी की मेहनत पर झपट्टा मारकर बना शरबत वहां मौजूद पुलिस वालों और तमाशबीनों ने भी बिना किसी लज्जा और संकोच के पीया। नाके पर ही उपचार मिलने के बाद दूधिया भारी मन से अपने बेटे के साथ गांव लौट गया।
इससे अंजान नहीं नेता
आंदोलन का नेतृत्व करने वाले किसान नेता भी इससे अंजान नहीं है। उनकी मजबूरी यह है कि शहरों की सीमा पर लगे नाकों पर चौबीस घंटे बैठने वाले किसान चाहिए। एेसे में कई समाजकंटकों ने आंदोलन में घुसपैठ कर ली है। गंगानगर किसान समिति के संयोजक रणजीत सिंह राजू का कहना है कि एेसी हरकतें करने वाले किसान नहीं। यह तो विरोधी लोग हैं जो उनके आंदोलन को फेल करने को तुले हैं।