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राजस्थानी कला संस्कृति को जीवित रखने में जुटा गाइड

सूरतगढ़.राजस्थान संपूर्ण राष्ट्र में अपनी संस्कृति तथा प्राकृतिक विविधता के लिए पहचाना जाता है। राजस्थानियों को पगड़ी (साफा) ने अलग पहचान दी है। शादी समारोह दूल्हा-बाराती हो अथवा राष्ट्रीय पर्व में अतिथि सबके सिर पर पगड़ी साफा पहनाकर इस अनमोल कला संस्कृति को 17 साल से बचाने में जुटा है स्थानीय पर्यटक गाइड देवेन्द्र सिंह शेखावत।

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सूरतगढ़.राजस्थान संपूर्ण राष्ट्र में अपनी संस्कृति तथा प्राकृतिक विविधता के लिए पहचाना जाता है। राजस्थानियों को पगड़ी (साफा) ने अलग पहचान दी है। शादी समारोह दूल्हा-बाराती हो अथवा राष्ट्रीय पर्व में अतिथि सबके सिर पर पगड़ी साफा पहनाकर इस अनमोल कला संस्कृति को 17 साल से बचाने में जुटा है स्थानीय पर्यटक गाइड देवेन्द्र सिंह शेखावत।
देवेंद्र ने बताया कि वह एक पर्यटक गाइड है जो राजस्थान संस्कृति को भली भांति से परिचित है और वह बचपन से ही साफा बांधने में रुचि रखता थे और धीरे-धीरे इस कला में निखार लाते गए और अब वह कई प्रकार के साफे बांध लेते हैं। जिसमें जयपुरी, जोधपुरी, मेवाड़ी, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेरी और शेखावाटी पगड़ी मुख्य है। देवेंद्र ने बताया कि पगड़ी गिने चुने लोगों या बुजुर्गों तक ही सीमित रह गई थी,लेकिन अब युवाओं का रुझान भी साफे के प्रति बड़ा है विशेष कर इन दिनों शादी समारोह में भी साफे का प्रचलन ज्यादा हो गया है।

साफा बांधने का है अलग अलग क्षेत्र में प्रचलन

उन्होंने बताया कि राज्य में विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से साफा बांधने का प्रचलन है। पुराने समय में राजा महाराजा जब युद्ध के मैदान में जाते थे ,तब सिर पर केसरियां साफा बांधकर जाते थे। इसके अलावा केसरिया भगवा रंग भी पहनते थे। यह रंग बहादुरी व बलिदान का प्रतीक माना जाता था। वही, गहरे रंग की पगडिय़ां ठंड के मौसम में पहनी जाती है। वही, सिर पर गर्मी के मौसम में हल्के रंग की पगड़ी पहनी जाती है। वही शादी समारोह में कुसुमल लाल तथा होली पर फागणिया पाग, अक्षय तृतीया आखातीज पर केसरियां रंग की पगड़ी पहनी जाती है। दीपावली पर्व पर मोर के गर्दन के रंग वाली पाग पहना जाता है। उन्होंने बताया कि गणतंत्र दिवस,स्वतंत्रता दिवस, राजस्थान दिवस और अन्य धार्मिक समारोह में होने वाले सरकारी कार्यक्रमों में अधिकारियों को निशुल्क साफा बांधने का कार्य लम्बे समय से किया जा रहा है। देवेन्द्र सिंह ने बताया कि साफा बांधना सीखने के लिए उन्होंने कोई शुल्क नहीं रखा हुआ है। उनके द्वारा सिखाए गए लोगों का रोजगार बन गया है।

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बिना दहेज पुत्र की शादी में दी नि:शुल्क सेवा

देवेन्द्र ने बताया कि गत वर्ष सूरतगढ़ निवासी दो परिवारों ने बिना दहेज पुत्र की शादी की तो उन्होंने भी सेवा स्वरुप वहां नि:शुल्क बारातियों के साफे बांधे और धार्मिक कार्यों में भी बिना रुपए ही सेवा दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि साफा बांधना भी एक कला है। इसे जीवित रखने के लिए ही लोगों को सीखा रहे हैं। यह परम्परा आगे बढ़े, इसके लिए युवाओं को इसे फैशन के रूप में समारोह व कार्यक्रमों में पहनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

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एक शाम धोरों के नाम कार्यक्रम में भी रही सराहनीय भूमिका

पर्यटक गाइड देवेन्द्र सिंह शेखावत ने श्रीगंगानगर स्थापना दिवस के उपलक्ष में हनुमान खेजड़ी मंदिर के पास आयोजित एक शाम धोरों के नाम कार्यक्रम में भी अहम भूमिका निभाई। पर्यटन विभाग के तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम स्थल पर तैयारियों से लेकर लोक गायक पार्टियों व लोक नृत्य पार्टियों की व्यवस्था का जिम्मा भी पर्यटक गाइड देवेन्द्र सिंह शेखावत पर रहा। उन्होंने बताया कि साफा बांधने के साथ साथ पहली बार ऐसा कार्यक्रम यहां रहा। प्रशासन के सहयोग से हनुमान खेजड़ी मंदिर के पास धोरों का चयन किया गया। यहां बहुत बढिय़ा कार्यक्रम हुआ। उन्होंने बताया कि सूरतगढ़ में पर्यटन स्थल के रुप में धोरों का चयन होना चाहिए। ताकि पर्यटन को बढ़ावा मिल सके।

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