13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मां का नाम ही बनता है पहचान

-भावनात्मक आधार पर बनता है मां-बेटी का रिश्ता

2 min read
Google source verification
programme

मां का नाम ही बनता है पहचान

श्रीगंगानगर.

आमतौर पर पहचान के लिए पिता के नाम को जरूरी माना जाता है, लेकिन एक समुदाय ऐसा भी है जहां पिता नहीं बल्कि मां ही पूरी जिंदगी व्यक्ति की पहचान रहती है। मां भी ऐसी जिसने व्यक्ति को जन्म नहीं दिया यानी वह जैविक रूप से मां भी नहीं है।
बस उसने बचपन से आज तक जिस व्यक्ति को गुरु के रूप में पाला उसे शिक्षा दिलाते समय मां का नाम भी दे दिया। जी हां, यह परम्परा है किन्नर समुदाय की, जहां आने वाले नए बच्चों को स्कूलों में पढऩे भेजा जा रहा है और पिता के नाम के स्थान पर उनकी मां का नाम ही उनके साथ अंकित है। केवल स्कूल ही नहीं इन लोगों के तमाम दस्तावेजों में इनकी गुरु मां का नाम ही अंकित है।


यूं बनता है मां बेटी का रिश्ता
किन्नर समुदाय में मां बेटी का यह रिश्ता भी किसी जैविक आधार पर नहीं टिका होता। किसी किन्नर सम्मेलन या किन्नर समुदाय के आयोजन में बस मां ने बेटी को देखा या फिर बेटी ने मां को। मन किया और बना लिया मां बेटी का रिश्ता। इसके लिए दोनों ने एक दूसरे को अपनी भावना से अवगत करवाया और फिर मां ने बेटी को उपहार दिए और बन गया जीवन भर का रिश्ता।


जिंदगीभर निभाते हैं संबंध
जम्मू और कश्मीर से आई राजस्थान और पंजाब के 22 किन्नर डेरों की प्रमुख हाजी मियां सायरा बताती हैं कि किन्नर समुदाय में मां-बेटी का यह संबंध जीवनभर चलता है। पूरी जिंदगी मां-बेटी एक दूसरे का साथ निभाती हैं। वे बताती हैं कि उनकी भी तीन बेटियां हैं। उन्होंने इन बेटियों को हर संभव सहयोग किया है और आगे भी इस रिश्ते को निभाती रहेंगी।


ये ही हमारी संतान
हाजी मियां सायरा बताती हैं कि सामान्य लोगों की संतान होती है लेकिन किन्नरों के लिए तो बस यही भावनात्मक संबंध है। वे अपने शिष्य बनाते हैं और उन्हें बच्चों की तरह पालते हैं। एक किन्नर के निधन के बाद उसके शिष्यों में से ही किसी एक को उसका उत्ताराधिकारी नियुक्त किया जाता है। जब कोई किन्नर मां बेटी जैसा संबंध बना लेता है तो फिर जीवन भर उसका ध्यान भी रखता है। मां या बेटी की किसी भी दुख तकलीफ में वह उसका साथ देता है।