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बंदी ने लगाया कपास पट्टी को ग्रहण

कपास पट्टी के नाम से मशहूर यह जिला जल्द ही अपनी यह पहचान खो सकता है। इंदिरागांधी, भाखड़ा व गंगनहर में अक्सर अप्रेल-मई में ली जाने वाली नहरबंदी ने इस फसल को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। इससे साल दर साल देसी कपास का बुवाई क्षेत्र घटता जा रहा है।

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बंदी ने लगाया कपास पट्टी को ग्रहण

बंदी ने लगाया कपास पट्टी को ग्रहण

-कई साल से अप्रेल में ली जा रही है नहरबंदी, पर्यावरण को भी खतरा बढ़ा

योगेश तिवाड़ी.
श्रीगंगानगर. कपास पट्टी के नाम से मशहूर यह जिला जल्द ही अपनी यह पहचान खो सकता है। इंदिरागांधी, भाखड़ा व गंगनहर में अक्सर अप्रेल-मई में ली जाने वाली नहरबंदी ने इस फसल को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। इससे साल दर साल देसी कपास का बुवाई क्षेत्र घटता जा रहा है।

करीब एक दशक पहले जिले में प्रति बीघा 8 से 10 क्विंटल तक देसी कपास का उत्पादन होता था। नहरबंदी के कारण इसका बुवाई क्षेत्र घटता गया, जिससे उत्पादन भी घट गया। जिले में उत्पादित कपास की विदेशों तक धाक थी। इसे एशियन कपास के नाम से जाना जाता था। चिकित्सा में काम आने वाली रुई और गाज पट्टी में इस कपास का इस्तेमाल होता था परन्तु अब इसकी जगह सिंथेटिक रुई ने ले ली है।

खरीफ फसलों का समय जून-जुलाई तक होता है जबकि देसी कपास के लिए बिजाई का उपयुक्त समय अप्रेल ही है। इससे अप्रेल में नहरों में सिंचाई पानी उपलब्ध नहीं होने से किसान इसकी बिजाई नहीं कर पाते। इस फसल की चुगाई 5-6 बार करनी पड़ती है जबकि नरमा में 3-4 चुगाई में ही काम चल जाता है। लेबर की कमी के कारण भी किसान का इससे मोह भंग हुआ है। एक अन्य बड़ा कारण देसी कपास के भाव नरमा की अपेक्षा कम रहना है।

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बीटी के चलते भूले देसी कपास को

श्रीगंगानगर में 2009 में 11.39 प्रतिशत हैक्टेयर में बीटी कपास(नरमा) की बिजाई हुई। कृषि विभाग और किसानों की रुचि के चलते 2021 तक जिले की 98 प्रतिशत भूमि पर बीटी कपास की बुवाई हो चुकी है। इससे देसी कपास का एरिया लगभग नगण्य हो चुका है। इससे देसी कपास लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है।

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जैव विविधता को खतरा

किसी पक्षी, पशु या फसल की प्रजाति नष्ट होने से प्राकृतिक असंतुलन पैदा होता है। यही स्थिति देसी कपास के साथ है। देसी कपास की जगह भी विदेशी किस्म बीटी कॉटन ने ली है। इस किस्म पर सुंडी का प्रकोप नहीं होता परन्तु जैव विविधता को खतरा बढ़ता जा रहा है जो पर्यावरण के लिए नुकसान दायक है।

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देसी कपास व नरमा में अंतर
देसी कपास--नरमा
1.रेशा पतला होता--रेशा मोटा होता है
2.शुद्ध देसी कॉटन मिलता है--मुलायम रेशा होता है
3.सूती कपड़ा बनता है--रेशमी कपड़ा बनता है
4.चिकित्सीय रुई बनती है--चिकित्सा के काम नहीं आता
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देसी कपास का बिजाई क्षेत्र घटने के कारण

1. अप्रेल में नहरबंदी लेना

2. चुगाई के लिए लेबर की कमी

3. नई किस्म का इजाद नहीं होना

4. फसल में कीट-व्याधि का प्रकोप

5. अप्रेल में किसानों का रबी में व्यस्त होना

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मुनाफे चक्कर में बदला विकल्प
किसानों को देसी कपास में अपेक्षाकृत लाभ नहीं मिल रहा था। मुनाफे के चक्कर में किसानों ने इसके विकल्प के रूप में पहले नरमा और इसके बाद बीटी नरमा को अपना लिया। हालांकि इससे जैव विविधता को खतरा उत्पन्न हो गया है।

-मिलिंदसिंह, कृषि अधिकारी अनुसंधान(शस्य), श्रीगंगानगर

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विकल्प ने पछाड़ा देसी कपास को

गुणवत्ता में देसी कपास का कोई सानी नहीं है परन्तु सस्ते विकल्पों ने देसी कपास को पछाड़ दिया। विदेशों तक धाक जमाने वाली श्रीगंगानगर की कपास से बेहतर गुणवत्ता की चिकित्सीय कॉटन और गाज पट्टी बनती थी। रजाई गद्दों में भी इसी कपास का इस्तेमाल होता था।
-आदित्य चितलांगिया, कॉटन व्यवसायी, श्रीगंगानगर

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वर्ष देसी कपास की बिजाई उत्पादन

2015-3567--11768

2016-7154--21462

2017-2244--6732

2018-2515--8425

2019-2604--13146

2020-945--3667

2021-764--3000

(स्रोत: कृषि विभाग, बिजाई हैक्टेयर व उत्पादन बैल्स में)