
पंजाब की औद्योगिक नगरी लुधियाना की औद्योगिक इकाइयों का खतरनाक रासायनिक अपशिष्ट सतलुज नदी में बहाने वाले बुड्ढ़ा नाला को ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर प्रदूषण मुक्त करने के प्रयास तीन दशकों से भी अधिक समय से हो रहे हैं, लेकिन वर्तमान में हालत जस के तस हैं। इस बीच पंजाब में कई सरकारें आई और गई। कई योजनाएं तो बनाई परन्तु धरातल पर नहीं उतरी।
स्थानीय लोगों ने कई आंदोलन भी किए, लेकिन इस समस्या के प्रति गंभीरता नहीं दिखाने का कोई परिणाम नहीं निकला। हाल यह है कि दोनों राज्य (पंजाब और राजस्थान) की सरकार मिलकर भी इस समस्या पर अभी तक कोई स्थाई समाधान नहीं निकाल सकी हैं। इस बीच पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केन्द्रीय जल प्रदूषण बोर्ड की कई ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिनमें बुड्ढ़ा नाला में बहने वाले रासायनिक अपशिष्ट को मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताते हुए इसे बिना शुद्धिकरण के सतलुज नदी में नहीं डाले जाने की सलाह दी गई थी।
2009 - संत बलवीर सिंह सीचेवाल के नेतृत्व में चेतना मार्च निकला, जिसमें पंजाब व राजस्थान के हजारों लोग शामिल हुए।
2024 - 24 अगस्त को रोष मार्च का आयोजन। इसमें पंजाब के किसान, सामाजिक कार्यकर्ता, श्रीगंगानगर जिले से जहर से मुक्ति आंदोलन तथा दूषित जल-असुरक्षित कल के कार्यकर्ता शामिल हुए।
2024 - काले पानी दा मोर्चा के आह्वान पर बुड्ढ़ा नाला को मिट्टी से पाटने के लिए 3 दिसम्बर को पंजाब के प्रभावित जिलों के किसान लुधियाना पहुंचे। राजस्थान से भी जहर से मुक्ति आंदोलन के कार्यकर्ता पंजाब के लिए रवाना हुए जिन्हें रास्ते में रोक लिया गया। सरकार ने सात दिन का समय मांगा लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।
पंजाब के जानेमाने पर्यावरणविद् एवं सांसद (राज्य सभा) संत बलवीर सिंह सीचेवाल का कहना है कि सतलुल नदी की पानी को प्रदूषित कर रहे बुड्ढ़ा नाला की समस्या के समाधान के लिए पैसे की कमी नहीं, भावना की कमी है। पत्रिका से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह मुद्दा पंजाब-राजस्थान के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इसके समाधान के लिए सरकार के मन में संवेदना होना जरूरी है। हमारा मालवा क्षेत्र कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी की चपेट में आ चुका है।
उन्होंने कहा कि यही पानी राजस्थान में जा रहा है तो वहां भी लोग कैंसर सहित अन्य बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। संत सीचेवाल का कहना था कि लुधियाना में इलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योग की शुरुआत 1986 में हुई। इस उद्योग की इकाइयों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट में सबसे खतरनाक धातु क्रोमियम है, जो कैंसर जैसी बीमारी का कारण बनती है। इस पर शोर मचा तो इस उद्योग से जुड़ी इकाइयां घरों में संचालित होने लगी और उनका रासायनिक अपशिष्ट सीवेज के साथ अपशिष्ट के साथ बुड्ढ़ा नाला के जरिए सतलुज नदी में जाने लगा। यह क्रम आज भी जारी है।
Published on:
23 Feb 2025 01:22 pm
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