
गंगनहर में आए सतलुज के पानी ने खोले समृद्धि के द्वार
-------------श्रीगंगानगर स्थापना दिवस पर विशेष-------------
श्रीगंगानगर. वर्तमान में श्रीगंगानगर जिले का जो इलाका सरसब्ज दिखाई देता है, वह कभी रेगिस्तान था। दूर-दूर तक फैला रेत का समंदर। वनस्पति के नाम पर आक, बुई, खींप और झड़ बेरी के पौधे या फिर केर, खेजड़ी और रोहिड़े के पेड़ जिनकी फितरत अकाल में भी लहलहाने की है। खेती पूरी तरह वर्षा पर आधारित थी। बरसात होने पर किसान बाजरा, मोठ, चना और जौ की बिजाई कर लेते थे। खेतों में उपजा यही धान साल भर खाने के काम आने के साथ-साथ अन्य जरूरतें पूरी करता था।
खेती के साथ पशुपालन भी आजीविका का साधन था। आवागमन के लिए एकमात्र सवारी था ऊंट। शहर जाना हो या फिर रिश्तेदारी में। रेतीले धोरों में सफर ऊंट पर ही होता था। गर्मी के मौसम में आंधी चलती थी तो कई-कई दिन तक रुकने का नाम नहीं लेती। इस आंधी में कोई यात्री रास्ता भटक जाता तो भूख-प्यास से उसकी मौत हो जाती शव पर कुछ ही घंटों में रेत का इतना बड़ा टीला बन जाता कि पास से गुजरने वाले को यह एहसास ही नहीं होता कि इस टीले के नीचे किसी की देह दफन है।
अकाल बना सुकाल का माध्यम
वर्ष 1890 में पड़े भीषण अकाल ने बीकानेर रियासत के अधीन इस इलाके में भी कहर बरपाया। बुजुर्ग उस अकाल को आज भी छप्पनिये अकाल के नाम से याद करते हैं। अकाल की विभीषिका ऐसी थी कि भूख से बचने के लिए लोगों को कीकर की छाल और भूरट के दाने तक चबाने पड़े। इस अकाल में बड़ी जनहानि हुई। पशु संपदा का भी भारी नुकसान हुआ।
मौत के पंजे से बचने के लिए बड़ी संख्या में लोगों ने उन इलाकों की ओर पलायन किया जहां पीने को पानी और खाने को रोटी मिल जाए। बीकानेर रियासत पर इस अकाल का असर कई सालों तक रहा। इससे मुक्ति के लिए तत्कालीन महाराजा गंगासिंह के दिमाग में पंजाब से सटी अपनी रियासत की भूमि को सरसब्ज करने की योजना बनी। उनकी योजना अंग्रेजों को पसंद आ गई और उन्होंने सतलुज नदी का पानी नहर के माध्यम से बीकानेर रियासत को देने की मंजूरी दे दी।
नए अध्याय की शुरुआत
अंग्रेजों की मंजूरी मिलने के बाद महाराजा गंगासिंह ने 1925 में गंगनहर का निर्माण शुरू करवाया। सतलुज का पानी गंगनहर में लेने के लिए फिरोजपुर के निकट हुसैनीवाला में हैडवक्र्स का निर्माण किया गया। 1927 तक नहर का निर्माण पूरा हो गया। इसके बाद 26 अक्टूबर 1927 को श्रीगंगानगर शहर से 18 किलोमीटर दूर शिवपुर हैड पर भव्य समारोह में महाराजा गंगासिंह ने पूजा अर्चना के बाद गंगनहर में जल प्रवाहित कर इस इलाके के लिए नए अध्याय की शुरुआत की। नदी का पानी बाढ़ के रूप में आता है तो अपने साथ तबाही लाता है। लेकिन नहर के माध्यम से आए सतलुज नदी के पानी ने इस इलाके मे समृद्धि के द्वार खोल दिए। गंगनहर ने ही बाद में भाखड़ा और इंदिरा गांधी नहर का मार्ग प्रशस्त किया।
आजादी के बाद दो और नहर परियोजनाओं की योजना बनी। पहले भखड़ा और फिर इंदिरा गांधी नहर का निर्माण हुआ। इन दो नहरों से सिंचाई शुरू हुई तो इस जिले का वह भू-भाग भी बारानी से सिंचित क्षेत्र में तब्दील हो गया जो गंगनहर से सिंचित क्षेत्र से बाहर था। गेहूं और कपास के उत्पादन में यह इलाका राज्य में अग्रणी हो गया। गेहूं का रिकार्ड उत्पादन कर सरदार बलवंत सिंह ने कृषि पंडित की उपाधि हासिल की, वहीं सरदार करतार सिंह नरूला ने किन्नू में यहां की आबोहवा की मिठास घोल कर उद्यान पंडित का सम्मान पाया।
यह सिलसिला थमा नहीं। इलाके में आज भी कई ऐसे प्रगतिशील किसान हैं जो कृषि क्षेत्र में नई विधियों और तकनीकों का उपयोग कर इतिहास रचने में लगे हैं। यह सिलसिला जारी रहेगा क्योंकि खेती यहां जीवन का आधार है।
Updated on:
26 Oct 2018 11:42 am
Published on:
26 Oct 2018 11:39 am
