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SriGanganagar जूती का कारोबार, फिर भी चमक बरकरार

Shoe business, yet shine remains intact- इलाके में पाक विस्थापितों ने पंजाबी जूती का बढ़ाया चलन

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SriGanganagar जूती का कारोबार, फिर भी चमक बरकरार

SriGanganagar जूती का कारोबार, फिर भी चमक बरकरार

श्रीगंगानगर। जूती कसूरी, पैरी न पूरी, हाय रब्बा वे सानू तुरना पिया…भारत विभाजन से पहले गायिका सूरिन्द्र कौर के लोकगीत की इन मशहूर पंक्तियों ने पांव में पहनी जाने वाली जूती की महत्ता का बखान किया था, तब कसूरी जूती पाकिस्तान के कसूरी शहर के बारे में बनती थी। दशकों बाद भी इस जूती के कारोबार की चमक अब तक बरकरार है। पाक के कसूर में जूती के कारोबार से जुड़े कारीगर विभाजन के बाद कई लोग पंजाब में बसे और वहां से इस इलाके में जूती का कारोबार बढ़ाया। जिला मुख्यालय से सटे कालियां गांव की जूतियां आज भी पहली प्राथमिकता है। इस गांव में पाक विस्थापित कई परिवार पंजाबी जूतियों को बनाने में लगे हुए है।

देश की आजादी के बाद पाक से आए इन परिवारों ने जूतियों को नया रूप दिया, इस कारण डिमांड अधिक रहती है। शाादियों में विशेष रूप से युवक-युवतियों को डिवाइजनदार जूतियों की मांग रहती है, इसे पूरा करने के लिए इलाके के कई लोग इसका निर्माण कर बेचान कर रहे है। जूते और चप्पलों के रिवाज होने के बावजूद पंजाबी जूती को पंजाबी समुदाय के साथ साथ इलाके के लोग पहनने लगे। यहां से जूतियों का व्यापार राजस्थान के कई जिलों के अलावा हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल तक पहुंच गया। पंजाबी परिवारों के कई लोग इग्लैंड, आस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका और दुबई में रहने लगे है लेकिन जूतियों को यहां से विशेष रूप से आर्डर से तैयार कर मंगवा रहे है।

इलाके में किन्नू के बाद पंजाबी जूतियां किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। देंश विदेश में इनकी धूम है। तिल्लेदार, मोतीयों, कढ़ाई वाली जूतीयां, लक्कमारवी, बेलबूटे वाली, जालबूटा, प्लेन, घोड़ी, खोसा, पुठ्ठी घोड़ी वाली, साठ बूटा, स्पॉट, स्पेशल स्पाट, मैटरो जूती, लक्की जूती, कन्ने वाली जूती, फैंसी, तिल्लेदार, सिप्पीमोती, दबका वर्क, फुलकारी वर्क, धागा वर्क और जरी वाली कढ़ाई आदि जूती काफी मशहूर हैं। दुकानदारों का कहना है कि इन जूतियों को ज्यादातर मलोट में तैयार किया जाता और बरेली में हाथ से बारीक कढ़ाई के लिए भिजवाया जाता था, तब यह स्पेशल जूती बनती। विशेष रूप से बनी इन जूतियों को वीआईपी जैसे लोगों के लिए उपलब्ध कराई जाती। लेकिन बदलते परिवेश में ज्यादातर काम मशीनों से होने लगा है।इसलिए घटे हाथ से बनी जूतियों के कद्रदान

पुराने दुकानदार भीमराज डाबी ने बताया कि हाथ से तैयार होने वाले जूतियों के कद्रदान घटने की वजह पैदल चलने वालों की कमी आना है। लोग पहले अपने खेतों के अलावा गांव या शहर में पैदल चलते थे, तब जूतियां ज्यादा टूटती और बनती थी। लेकिन अब लोग पैदल कम चलते है और चप्पल पहनने लग गए, ऐसे में हाथसे बनी जूतियों की डिमांड सीमित होकर रह गई। अब सिर्फ शादियों या पार्टियों या विशेष ड्रेस की मैचिंग के लिए जूतियां खरीदी जा रही है। डाबी के अनुसार केन्द्र और राज्य सरकारों ने जूतियों के बनाने वाले हुनर कारीगरों के लिए विशेष पैकेज नहीं दिया और न ही विशेष पॉलिसी बनाई, इस कारण यह धंधा सीमित होकर रह गया है।

कारोबारी लीलाधर डाबी, दुकानदार मनोज, नरेन्द्र आदि दुकानदाराें का कहना है कि हाथ से तैयार होने वाले जूतियों के कद्रदान घट गए। इसके अलावा जूती बनाने के लिए चमड़े के दाम आसमान को छू रहे है। कई कारीगरों के हाथों से तैयार हुई जूती दूकान पर पहुंचती है तो ग्राहक पुराने दाम पर ही जूती मांगते हैं जबकि जूती बनाने के संबंध में कच्चा माल महंगा होने के कारण उन्हें मुनाफा कम होता है। वहीं मशीनों से बनने वाले जूतियों के कारण कई परिवार इस काम को छोड़ चुके हैं। हालांकि मशीनों से तैयार होने वाली जूतियों से दाम पहले से कम हुए है। रेलवे स्टेशन रोड पर जूतियों की बिक्री के लिए कई दुकानें खुली हुई है। इन दुकानों पर दो सौ से तीन हजार रुपए तक की जूतियां उपलब्ध है।