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जांबाज जासूस रवीन्द्र कौशिक का परिवार कर चुका पलायन

The family of brave detective Ravindra Kaushik has escaped- हिन्दी फिल्मों की कहानी में पात्र बनकर रह गया हमारा ब्लैक टाइगर

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जांबाज जासूस रवीन्द्र कौशिक का परिवार कर चुका पलायन

जांबाज जासूस रवीन्द्र कौशिक का परिवार कर चुका पलायन

श्रीगंगानगर. इलाके का जांबाज जासूस रवीन्द्र कौशिक उर्फ 'ब्लैक टाइगर ने पाकिस्तान में पहुंचकर अपनी जासूसी का जाल ऐसा बिछाया किया पाकिस्तान की सेना के पसीने छूटने लगे थे।

इस किरदार के बहादूरी पर हिन्दी फिल्में भी बनी लेकिन सरकार के स्तर पर उसकी शहादत अब तक गुमनामी के अंधेरे में है।

श्रीगंगानगर पुरानी आबादी के महर्षि दयानंद वाटिका के पास संकरी गली में छोटे से मकान में रहने वाले इस सपूत का परिवार यहां से पलायन कर चुका है।

उसकी पत्नी अपने बेटे के साथ हैदराबाद शिफ्ट हो गई है। एक बेटी जिसकी जयपुर में शादी हो चुकी है। उसके परिवार के कई लोग भी यहां से जा चुके है। इस भारतीय सपूत की शहादत को अभी तक सरकार ने स्वीकार नहीं किया है।

इस वजह से उनके नाम से शहर के किसी भी जगह उनके नाम से स्कूल या मार्ग का नामकरण नहीं हो पाया है। हालांकि वार्ड 10 में रवीन्द्र कौशिक वाटिका जरूर बनाई गई है।

इधर, पुरानी आबादी के दिनेश का कहना है कि कौशिक की मृत्यु की जानकारी मिलने के बाद यह परिवार टूट सा गया था। पूरे परिवार के सदस्य यहां से शिफ्ट हो चुके है।

इस भारतीय जासूस ने पाकिस्तान जाकर पाक सैनिक से मेजर का पद हासिल किया। लेकिन जब वह पकड़ा गया तो भारत सरकार ने किसी तरह की कोई मदद नहीं की, यहां तक कि उसकी मौत के बाद उसका शव भी देश नहीं लाया जा सका।

जाबांज जासूस 'रविन्द्र कौशिक उर्फ 'ब्लैक टाइगर पाकिस्तान के हर कदम पर भारत भारी पड़ता था क्योंकि उसकी सभी योजनाओं की जानकारी कौशिक की ओर से भारतीय अधिकारियों को दे दी जाती थी।

रंगमंच कमी से बना जासूस श्रीगंगानगर के रहने वाले रविन्द्र कौशिक का जन्म 11 अप्रैल 1952 को हुआ। उसका बचपन यहां पुरानी आबादी में बीता। बचपन से ही उसे थियेटर का शौक था इसलिए बड़ा होकर वो एक थियेटर कलाकार बन गया।

जब एक बार वो लखनऊ में एक प्रोग्राम कर रहा था तब भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के अधिकारियों की नजर उस पर पड़ी। उसमे उन्हें एक जासूस बनने के सारे गुण उनमें नजर आए।

रॉ के अधिकारियों ने उससे मिलकर उसके सामने जासूस बनकर पाकिस्तान जाने का प्रस्ताव रखा जिसे कि उसने स्वीकार कर लिया। उसकी ट्रेनिंग शुरू की। पाकिस्तान जाने से पहले दिल्ली में करीब दो साल तक उसकी ट्रेनिंग चली। उसे उर्दू, इस्लाम और पाकिस्तान के बारे में जानकारी दी गई।

ट्रेनिंग समाप्त होने के बाद मात्र 23 साल की उम्र में रविन्द्र को पाकिस्तान भेज दिया गया। पाकिस्तान में उसका नाम बदलकर नवी अहमद शाकिर कर दिया गया।

चूंकि रविन्द्र श्रीगंगानगर का रहने वाला था जहां पंजाबी बोली जाती है और पाकिस्तान के अधिकतर इलाकों में भी पंजाबी बोली जाती है इसलिए उसे पाकिस्तान में सेट होने में ज्यादा दिक्कत नहीं आई।

पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पढाई के लिए यूनिवस्रिटी में दाखिला लिया जहां से उसने कानून में ग्रेजुएशन किया। पढाई खत्म होने के बाद वो पाकिस्तानी सेना में शामिल हो गया तथा प्रमोशन लेते हुए मेजर की रैंक तक पहुँच गया। इसी बीच उसने वहां पर एक आर्मी अफसर की बेटी अमानत से शादी कर ली तथा एक बेटी का पिता बन गया।

रविन्द्र कौशिक ने 1979 से लेकर 1983 तक सेना और सरकार से जुडी अहम जानकारियां भारत पहुंचाई। रॉ ने उसके काम से प्रभावित होकर उसे ब्लैक टाइगर के खिताब से नवाजा।

पर 1983 में कौशिक से मिलने के लिए रॉ ने एक और एजेंट पाकिस्तान भेजा। लेकिन वह पाकिस्तान खुफिया एजेंसी के हत्थे चढ़ गया।

लंबी यातना और पूछताछ के बाद उसने रविंद्र के बारे में सब कुछ बता दिया। रविंद्र ने भागने का प्रयास किया, लेकिन भारत सरकार ने उसकी वापसी में दिलचस्पी नहीं ली।

रविंद्र को गिरफ्तार कर सियालकोट की जेल में डाल दिया गया। पूछताछ में लालच और यातना देने के बाद भी उसने भारत की कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। 1985 में उसे मौत की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में उम्रकैद में बदला गया।

मियांवाली जेल में 16 साल कैद काटने के बाद 2001 में उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के बाद भारत सरकार ने उसका शव भी लेने से मना कर दिया। रविंद्र ने जेल से कई पत्र अपने परिवार को लिखीं। वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों की कहानी बताता था।

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