सुलतानपुर. गुरु की पूजा का पर्व है गुरु पूर्णिमा। इस दिन शिष्य अपने गुरुओं से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। जीवन में गुरु के महत्व का वर्णन करते हुए संत तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि ‘गुरु बिन भवनिधि तरइ न कोई। जो बिरंचि शंकर सम होई’ और कबीरदास जी ने गुरु को गोविंद से भी ऊंचा स्थान माना है। यह कहना है आचार्य डॉ. शिवबहादुर तिवारी का।
आचार्य तिवारी ने बताया कि आदिकाल से सनातनधर्म में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है। शिवपुराण में इस प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है कि गुरु पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के अंशावतार भगवान वेदव्यास का जन्म हुआ था। चारों वेदों का बृहद वर्णन करने और वेदों का सार ब्रह्मसूत्र की रचना करने के फलस्वरूप ही ये महर्षि व्यास नाम से विख्यात हुए थे। इन्होंने महाभारत सहित 18 पुराणों एवं अन्य ग्रन्थों की भी रचना की थी। गुरुपूर्णिमा को भगवान वेदव्यास सहित दुनिया भर में गुरुओं की पूजा की जाती है।
आचार्य डॉ तिवारी गुरु पूर्णिमा पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि दुनिया भर में शैक्षिक ज्ञान एवं साधना करने के उद्देश्य से सृष्टि के आरम्भ से ही गुरु-शिष्य परंपरा का जन्म भी हो गया था। आचार्य के अनुसार ब्रह्मा को अज्ञानता से मुक्त करने के लिए भगवान ने अपने हृदय से योगियों के सूक्ष्मतत्व श्रीरूद्र को प्रकट किया, जिन्होंने ब्रह्मा के अंतर्मन को विशुद्ध करने के लिए ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करने का ज्ञान देकर ब्रह्मा का मोहरूपी अन्धकार दूर किया था। आचार्य बताते हैं कि अपने शिष्य को ‘तमसो मा ज्योतिगर्मय’ अंधकार की बजाय प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुता है। प्रत्येक युग में गुरु की सत्ता परमब्रह्म की तरह कण-कण में व्याप्त रही है। गुरु विहीन संसार अज्ञानता की कालरात्रि के समान ही होता है। गुरु की कृपा प्राप्ति के बगैर जीव संसार सागर से मुक्त नहीं हो सकता चाहे वह ब्रह्मा और शंकर के समान ही क्यों न हो।
कबीरदास जी ने गुरु के गुणों का वर्णन करते हुए कहा है कि पूरी धरती को कागज, सभी जंगलों को कलम और समुद्र को स्याही समझकर अगर गुरु के गुणों का वर्णन लिखा जाए तो भी गुरु गुन लिखा न जाय “।
आचार्य डॉ शिवबहादुर तिवारी गुरु का शाब्दिक अर्थ समझाते हुए कहते हैं कि शास्त्रों में ‘गु’ का अर्थ अंधकार या अज्ञान, और ‘रु’ का अर्थ उसका निरोधक अर्थात ‘प्रकाश’ बताया गया है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि शिष्य के अज्ञानता का अपने ज्ञान से निवारण कर देता है। अर्थात अपने अज्ञानी शिष्य को अंधकार से हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला ‘गुरु’ ही होता है । आचार्य श्री बताते हैं कि शिष्य अपने गुरु के प्रति हमेशा समर्पण भाव रखता है । इसलिए वह हमेशा यह समझता है कि गुरु ने मुझे सब कुछ दे दिया, जो कुछ हुआ है, सब गुरु की कृपा से ही हुआ है। असली महिमा उस गुरु की ही है, जिसने शिष्य को आत्मबोध कराया, आत्मज्ञान के मार्ग पर चलाया।
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