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इनके लिये श्रीमती लिखना पालिका अध्यक्ष को पड़ा भारी, देना पड़ सकता है 5 लाख का मुआवजा

सुलतानपुर जिलाधिकारी विवेक कुमार ने कहा कि प्रकरण की लिखित शिकायत सोनम किन्नर द्वारा की गयी है...

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इनको श्रीमती लिखना पालिका अध्यक्ष को पड़ा भारी, देना पड़ सकता है 5 लाख का मुआवजा

सुलतानपुर. नगर पालिका परिषद अध्यक्ष पद की पूर्व प्रत्याशी सोनम किन्नर के जमीन खारिज दाखिल के आवेदन पत्र पर नगर पालिका परिषद के पारित आदेश ने जिले में हडकंप मचा दिया। जमीन के दाखिल खारिज की पत्रावली पर पालिका अध्यक्ष बबीता जायसवाल द्वारा पारित आदेश में किन्नर सोनम को श्रीमती सोनम किन्नर लिखा गया है। जो कि वस्तुतः विवाहित स्त्रियों के सम्बोधन में नाम के आगे प्रयोग किया जाने वाला शब्द है। पालिका अध्यक्ष द्वारा लिखा गया श्रीमती शब्द को किन्नर समाज अपने को अपमानित करने वाला शब्द मानता है। पालिका अध्यक्ष पद की पूर्व प्रत्याशी सोनम किन्नर ने जिलाधिकारी विवेक कुमार से लिखित शिकायत कर विधिक कार्यवाही की मांग की है। सोनम ने शिकायती पत्र में 5 लाख रुपये मानहानि के एवज में मुवावजा हानि छतिपूर्ति की भी मांग की है। गौरतलब है कि बबीता जायसवाल भाजपा से जुड़ी हैं। इनके पति अजय कुमार जायसवाल मौजूदा जिला पंचायत सदस्य हैं।

क्या कहते हैं जिलाधिकारी विवेक कुमार
जिलाधिकारी विवेक कुमार ने कहा कि प्रकरण की लिखित शिकायत सोनम किन्नर द्वारा की गयी है। सोनम किन्नर के प्रार्थना पत्र पर मेरे द्वारा तत्काल प्रभाव से पांच दिनों में जांच रिपोर्ट नगर पालिका परिषद अध्यक्ष से मांगी गयी है। जिलाधिकारी ने कहा कि अगर यह प्रकरण त्रुटिवश है तो नगर पालिका परिषद अध्यक्ष बबिता जायसवाल द्वारा संशोधित पत्र जारी किया जाना चाहिए, अन्यथा जांच रिपोर्ट के आधार पर वैधानिक कार्यवाही की जाएगी।

सोनम किन्नर बोली- मैं किसी की श्रीमती नहीं
सोनम किन्नर ने कहा कि अगर पांच दिनों में इस प्रकरण पर जिला प्रशासन ने कार्यवाही नहीं की तो पांच दिन के बाद पूरे प्रदेश के किन्नर समाज को बुलाकर जिलाधिकारी कार्यालय पर किन्नर महापंचायत का आयोजन कर सामंतवादियों के विरुद्ध आवाज बुलंद की जाएगी। उन्होंने नगरपालिका अध्यक्ष को चैलेंज देते हुए कहा कि अगर मैं श्रीमती (विवाहिता) हूं तो मेरे शौहर को समाज के सामने लाया जाये।

खारिज दाखिल नहीं कर सकते पालिका अध्यक्ष
पालिका क्षेत्र में क्रय की गई जमीनों के खारिज दाखिल का मामला है तो विधि के जानकारों का साफ कहना है कि जनता द्वारा चुने हुए व्यक्ति को न्यायिक मजिस्ट्रेट का अधिकार प्राप्त नहीं होता। लेकिन बिडम्बना यह है कि पूरे प्रदेश में नगरपालिका अध्यक्ष जमीनों के मामले निपटाने के लिए न्यायालय चलाते हैं। उसमें बकायदे अधिवक्ता पत्रावलियों के साथ पेश होकर दलीलें देते हैं और पालिका अध्यक्ष निर्णय देते हैं। इसका सबसे आश्चर्य जनक पहलू यह है कि इन फैसलों के खिलाफ विभिन्न न्यायालयों में अपील भी होती है। कुछ जानकर बताते हैं कि पालिका अध्यक्ष को न्यायिक निर्णय देने के अधिकार नहीं हैं, लेकिन ऐसी परम्परा चली आ रही है।