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मान्यता: इस दर पर टेका माथा तो निसंतान दंपतियों की पूरी होती आशा

सुल्तानपुर में एक ऐसा मंदिर है, जहां दर्शन करने मात्र से लोगों का कष्ट हो जाता है दूर और निःसन्तानों की सूनी गोद में किलकारियां गूंजने लगती हैं। यह मंदिर है सती माता मंदिर का, यहाँ की परंपरा भी अनोखी है।

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Sati Mata Mandir File Photo

सुल्तानपुर में एक ऐसा मंदिर है, जहां दर्शन करने मात्र से लोगों का कष्ट हो जाता है दूर और निःसन्तानों की सूनी गोद में किलकारियां गूंजने लगती हैं। हम बात कर रहे हैं सुलतानपुर मुख्यालय से 8 किमी दूर लखनऊ-वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित हनुमानगंज बाजार के निकट पखरौली रेलवे क्रासिंग के पास मौजूद सती माता मंदिर की। जहां हर रविवार और मंगलवार को हजारों भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए मत्था टेकने पहुंच कर सती माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं और ऐच्छिक मनोकामना पूर्ण करते हैं।

400 साल पुराना है इतिहास

सती माता के मंदिर के बारे में वहां के पुजारी आचार्य सतीश चंद्र पांडेय बताते हैं कि यह धाम करीब 400 साल पहले जब सती प्रथा के समय पति की मृत्यु पर पत्नी भी पति के चिता के साथ अपना प्राण त्याग देती थीं। उन्होंने बताया कि करीब 400 साल पहले पखरौली गांव के निवासी प्यारेलाल श्रीवास्तव के परिवार के एक पुरूष यदुनाथ श्रीवास्तव की मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद पत्नी सुमित्रा ने भी पति की जलती चिता में कूदकर अपने शरीर को त्याग दिया था। ग्रामीणों के मुताबिक यह घटना करीब 400 साल पहले की है। धीरे -धीरे ग्रामीणों का उसी स्थान से आवागमन शुरू हुआ और लोग सती माता की पूजा अर्चना करने लगे। पूजा करने वाले लोगों को वहां से चमत्कारी फायदा होने लगा। मसलन, वहां पहुंचकर लोगों की कई गम्भीर बीमारियों से निजात मिलने लगी और कई लोगों को जिनके कोई सन्तान नहीं थी, उन्हें सन्तान सुख प्राप्त हुआ। कुछ ही समय में सती माता के स्थान के प्रभाव का दूर दूर तक डंका बजने लगा।

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माता के दर्शन को आने लगे लोग

सती माता के स्थान के प्रभाव से प्रभावित होकर दूर-दराज से लोग जुटने लगे और लोगों की मनोकामना पूर्ण होने लगी। पुजारी कमला प्रसाद शुक्ल का कहना है कि सोमवार शुक्रवार मंगलवार और रविवार को भक्तों की ज्यादा भीड़ जमा होती है। कुछ समय बाद सती माता के मंदिर के दक्षिण बगल मंजू कसौधन पत्नी अनिल कुमार कसौधन ने 40 वर्ष पूर्व हनुमानजी का मन्दिर बनवाया। दोनों मन्दिरों के बीच में दुर्गा जी का मंदिर भी बनवा दिया । पुजारी कमला प्रसाद शुक्ल बताते हैं कि पहले यहां मिट्टी का चबूतरा था । वर्षों तक लोगों ने मिट्टी के चबूतरे पर ही पूजा अर्चना की । लेकिन सती माता के पुजारी रहे पंडित राम धीरज शुक्ल ने सन 1979 में मंदिर का निर्माण कराया । लेकिन अब मन्दिर की देखरेख पंडित कमला प्रसाद शुक्ल कर रहे हैं । उनका कहना है कि यहां जो भी आया ,खाली हाथ नहीं लौटा । माता ने सबकी झोली खुशियों से भर दी है । यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए श्रद्धा और भक्ति का केन्द्र बना हुआ है ।