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प्राचीन काल से विराजे हैं अंधेश्वर महादेव

सावन के सोमवार को लगती है भक्तों की भीड़

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सूरत

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Vineet Sharma

Aug 19, 2018

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प्राचीन काल से विराजे हैं अंधेश्वर महादेव

नवसारी. सोमवार के पावन माह में जिले के प्राचीन शिव मंदिरों में दूर-दूर से शिव भक्त उनके दर्शन और पूजन को उमड़ते हैं। कहा जाता है कि यहां स्वयंभू शिवलिंग स्थापित हैं और इसका जिक्र अंबिका पुराण में है। शिवलिंग की एक अन्य कथा अंधे बंजारे से जुड़ी है, जिसकी गाय रोजाना शिवलिंग का अपने दूध से अभिषेक करती थी और भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने बंजारे को दृष्टि दी थी।

गणदेवी के अमलसाड स्थित प्राचीन अंधेश्वर महादेव मंदिर भक्तों की आस्था का बड़ा केन्द्र है और बड़ी संख्या मे शिवभक्त यहां दर्शन का लाभ लेते हैं। अंधेश्वर महादेव मंदिर के स्वयंभू शिवलिंग का इतिहास 900 साल पुराना है। अंबिका पुराण के अनुसार भगवान शिव ने शक्तिशाली राक्षस अंधक को अपने त्रिशुल की नोक पर चढ़ाकर हराया था और बाद में उसे अपने गण में शामिल किया। कथा के अनुसार शिवलिंग अंधक के देव अर्थात अंधेकेश्वर या अंधेश्वर कहलाया।

लोक कथाओं के अनुसार अमलसाड के जंगलों में बसते एक अंधे बंजारा की गाय झाडिय़ों में स्वयंभू शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक करती थी। बंजारे को इस बात की जानकारी मिली तो उसने श्रद्धाभाव से शिवलिंग की पूजा की। इस दौरान चमत्कार हुआ और उसे नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई। इस घटना के बाद शिवलिंग अंधेश्वर के नाम सेें प्रसिद्ध है। बाद में वंजारा ने यहां 84 खंभों का शिवालय बनवाया। 1400 ई.स में गणदेवी के देसाइयों ने मंदिर का जिर्णोद्धार करवाया। बाद मे पेशवा और चालुक्य काल में मंदिर को फिर से बनवाया गया।

आज भी चालुक्य काल के अवशेष मंदिर ट्रस्ट ने म्युजियम बनाकर संजोकर रखा है। जिनमें नंदी, चपटघाट का कछुआ, गंगाजी, देवी पार्वती की मूर्ति, उमा महेश की त्रिभंगी मूर्ति आदि मंदिर के म्युजियम में संग्रहित हैं। वर्ष 2011 में दो करोड़ की लागत से अंधेश्वर महादेव मंदिर का एक बार फिर से जिर्णोद्धार किया गया था। आज भी पौराणिककालीन अंधेश्वर महादेव मंदिर के लिए शिवभक्तों की भीड़ लगती है। सोमवार को यहां श्रद्धालुओं की भीड़ बहुत ज्यादा रहती है।