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समेटे है सदियों का इतिहास

तापी किनारे सूरत के ऐतिसासिक किले का हो रहा रेस्टोरेशन

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सूरत

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Vineet Sharma

Oct 13, 2020

समेटे है सदियों का इतिहास

समेटे है सदियों का इतिहास

विनीत शर्मा

सूरत. तापी किनारे सूरत का ऐतिसासिक किला कई सौ बरस का इतिहास अपने में समेटे हुए है। इसकी दीवारें तक अलग ही अंदाज में अपने खास होने का अहसास दिलाती हैं। मनपा प्रशासन ने वर्ष २०१२ में किले को अपने नियंत्रण में लेकर इसके पुराने गौरव को वापस दिलाने का काम हाथ में लिया है। हेरिटेज स्क्वायर प्रोजेक्ट के तहत चल रहे किले के रेस्टोरशन के पहले चरण का काम पूरा हो चुका है और दर्शकों के लिए खोल दिया गया है। फिलवक्त दूसरे चरण का काम चल रहा है।

इसके तहत नदी किनारे घंटा घाट, कस्तूरबा गार्डन, राजा घाट, एन्ड्रयूज लाइब्रेरी, पुराना किला, किले के आगे की जगह, गांधी बाग और नदी किनारे के हिस्से को शामिल किया गया। किले का रेस्टोरेशन भी प्रोजेक्ट का हिस्सा है। रेस्टोरेशन का काम जैसे-जैसे आगे बढ़ा और किले की तस्वीरें सामने आईं, साफ हो गया कि हेरिटेज संरक्षण के लिए मनपा प्रशासन की कोशिशें सफल रही हैं।

किले का इतिहास

सदियों पुराना, वास्तु कला का बेजोड़ नमूना सूरत का किला प्राचीन वास्तु कला का बेजोड़ नमूना है। इसे मुगल काल में (१३७३) बादशाह फिरोज तुगलक ने भीलों के हमले से सूरत शहर की हिफाजत के लिए बनवाया था। तब किला छोटा था। दो सदी बाद पुर्तगालियों के हमले बढ़े तो अहमदाबाद के राजा सुलतान महमूद (तृतीय) ने बड़े और मजबूत किले की जरूरत महसूस करते हुए इसको वर्ष १५४० में बड़े किले में तब्दील करवाया। इसके निर्माण का जिम्मा तुर्की सैनिक साफी आगा को दिया गया, जिन्हें खुदावंद खान के खिताब से नवाजा गया था। बाद में ब्रिटिश शासन काल के दौरान भी किले में कुछ और निर्माण किए गए।

पहेली बने हुए हैं कई हिस्से

किले के कई हिस्से आज भी पहेली बने हुए हैं। ब्रिटिश काल के बाद सालों तक किला सरकारी विभागों का दफ्तर बना रहा। बाद में जीर्णोद्धार के लिए इसे खाली कराया गया तो कई नई जानकारियां सामने आईं। इसमें कई कमरों में सुरंग होने का पता चला। यह गुप्त रास्ते कहां तक फैले हुए हैं, यह अब भी पहेली है। किले से ब्रिटिश काल के कुछ पोस्टर मिले थे, जिनसे पता चलता है कि तापी नदी से घिरे इस किले तक पहुंचने के लिए पहले एक ड्रॉ-ब्रिज था, जो अवांछित लोगों को आने से रोकने के लिए बंद रखा जाता था। यह ड्रॉ-ब्रिज बाद में हटा दिया गया था।एक पुराने पोस्टर से यह भी पता चलता है कि ब्रिटिश काल में यहां फांसी देने का काम भी किया जाता था।