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WAY OF GANDHI : यहां युवाओं के विचारों में घूमता है चरखा

- युवा पीढ़ी में गांधी की तलाश...- बारडोली में साकार हो रही गांधीजी की 'नई तालीम' - स्वराज आश्रम में प्रतिवर्ष सवा सौ छात्राएं गांधीयन फिलासफी के साथ पढ़ाई कर दे रही स्वालंबन का संदेश  

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सूरत

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Pradeep Joshi

Sep 30, 2021

WAY OF GANDHI :  यहां युवाओं के विचारों में घूमता है चरखा

WAY OF GANDHI : यहां युवाओं के विचारों में घूमता है चरखा

प्रदीप जोशी. बारडोली (सूरत).

बारडोली में गांधीजी का स्वराज आश्रम आज भी सक्रिय है। यहां चरखा एक विचार बन गया है। आश्रम में चल रहे स्वराज सरदार कन्या विद्यालय व छात्रालय मेंं प्रतिवर्ष सवा सौ आदिवासी व जरूरतमंद छात्राएं गांधीयन फिलासफी के साथ पढ़ाई करती हैं। यहां से उत्तीर्ण करीब पांच हजार छात्राएं इंजीनियर, डॉक्टर आदि सहित देश के कई महत्वपूर्ण पदों पर हंै और गांधी दर्शन को प्रचारित करतीं हैं।

यहां तपोवनी संस्कृ ति तथा गांधीजी की 'नई तालीम' पद्धति को मिलाकर प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। दरअसल,1922 में चौरीचौरा में अहिंसा की घटनाएं होने पर गांधीजी नेे बारडोली को सत्याग्रह की प्रयोगशाला बनाते हुए आजादी के आंदोलन में ज्यादा से ज्यादा युवाओं को जोडऩे का तय किया।

इसके लिए रचनात्मक ता कार्यों को मिशन बनाया। जिसमें सबसे पहले क्षेत्र के 'रानीपरज' (आदिवासी) युवाओं को राष्ट्रीय चेतना जागृत करने के लिए चुना। इसके बाद गांधीजी के अनुयायी निरंजना बेन कलार्थी व मुकुल भाई कलार्थी ने सन 1966 में स्वराज सरदार कन्या आवासीय विद्यालय शुरू किया।

जिसमें तपोवन संस्कृति तथा गांधीजी की नई तालीम पद्धति को मिलाकर शिक्षा के साथ स्वालंबन का पाठ्यक्रम तैयार किया। यहां रहने वाली सभी बेटियां स्वालंबन अपनाती हैं। अपने पाखाने से लेकर आंगन तक की सफाई खुद करती है। समय प्रबंधन के साथ प्रार्थना, श्रमदान व किचन गार्डनिंग सहित कई कार्यों के बीच रोज आधा घंटा सामूहिक चरखा चलातीं हैं।


चरखे से 100 फीसदी रिजल्ट :


आश्रम में ही पढ़कर डॉक्टर बनीं प्रज्ञा बताती हैं कि प्रतिदिन आधा घंटा चरखे पर रुई की गांठ खोलने से लेकर धागा बनाने तक ना केवल डिप्रेशन-फ्रस्टेशन दूर होता है, बल्कि रचनात्मकता व एकाग्रता के साथ चरखा चलाने से बच्चों में मल्टी टास्किंग बढ़ती हंै। बैठने की मुद्रा व एकाग्र मस्तिष्क यौगिक आसन की तरह होता है।

यही कारण है कि कई सालों यहां गुजरात बोर्ड का एसएससी रिजल्ट 100 प्रतिशत आया है। यहां के युवा सकरात्मक विचारों से भरे हुए हैं। नकारात्मक सोच के लिए समय ही नहीं है। आत्मनिर्भरता व आर्थिक विकें्रदीकरण का मॉडल चरखा स्वयं घूमता विचार है। जिसे युवा जीवन चक्र में महसूस कर रहे हैं।

अहिंसा से दूर रखने के लिए रचनात्मकता की ओर मोड़ा :


महात्मा गांधी ने 1921-22 में सविनय कानून भंग करने के लिए बारडोली को पसंद किया, लेकिन 1922 में चौरीचौरा की घटनाएं से आहत गांधीजी ने यह कहकर सविनय अवज्ञा आंदोलन टाल दिया कि अभी हमारा मनोबल अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार नहीं है। इसके बाद ही गांधीजी ने तय किया कि आजादी के आंदोलन में अधिक से अधिक युवाओं की भागीदारी होना जाएगी।

उन्होंने युवाओं को अहिंसा से दूर रखने के लिए उन्हें रचनात्मक कार्यों से जोड़ा। तभी से स्वराज आश्रम के अलावा आज भी चप्पा- चप्पा चरखें का जोर है। कई बार सवा लाख वार सूत काटने का अखंड महायज्ञ होता है।
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