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पठान के विरोध के बीच गांधी वर्सेस गोडसे : एक युद्ध…000 ‘विचार रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन जान लेने का किसी को नहीं है।’

फिल्म निर्देशक राजकुमार संतोषी से पत्रिका की विशेष बातचीत प्रदीप जोशी। सूरत। 'पठान' के पठानी विरोध के बीच 26 जनवरी को 'गांधी वर्सेज गोडसे : एक युद्ध' रिलीज हुई। फ़िल्म के रूप में एक बार फिर नया वैचारिक द्वंद उभरने लगा है।  

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सूरत

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Pradeep Joshi

Jan 29, 2023

पठान के विरोध के बीच गांधी वर्सेस गोडसे : एक युद्ध...000 'विचार रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन जान लेने का किसी को नहीं है।'

पठान के विरोध के बीच गांधी वर्सेस गोडसे : एक युद्ध...000 'विचार रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन जान लेने का किसी को नहीं है।'

प्रदीप जोशी। सूरत। 'पठान' के पठानी विरोध के बीच 26 जनवरी को 'गांधी वर्सेज गोडसे : एक युद्ध' रिलीज हुई। फ़िल्म के रूप में एक बार फिर नया वैचारिक द्वंद उभरने लगा है। फिल्म का ट्रेलर आने के बाद से ही मध्यप्रदेश और कई जगह विरोध की आग लगी हुई है। खासकर कांग्रेस नेताओं ने फिल्म निर्देशक राजकुमार संतोषी और सह-निर्माता भोपाल के शिवम त्रिवेदी के पुतले जलाकर धमकी दी है, उन्हें सशस्त्र पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई गई है। विरोध करने वालों का कहना है कि गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को महिमामंडित किया जा रहा है। राजस्थान पत्रिका ने इसे लेकर दशकों तक फिल्म इंडस्ट्रीज में घायल, दामिनी जैसी कई सफल फिल्में देने वाले निर्देशक राजकुमार संतोषी से विशेष बातचीत की।
* फिल्म में ऐसा क्या है, जिसका कुछ लोग विरोध कर रहे हैं ?
राजकुमार : विरोध करने वालों के मन में कुछ और है। वे पहले खुले दिमाग से फिल्म देखें। भगतसिंह पर बनी मेरी फिल्म में भी वही था, जो इतिहास में दर्ज है। इसमें भी गांधीजी के विचारों को जस का तस रखा है। इसमें गोडसे के उन रिकॉर्डेड बयानों को दिखाया है, जिन्हें वर्षों से बैंन करके रखा गया था। दो वर्ष पहले ही इन्हें सार्वजनिक कर सकने की मंजूरी दी गई है। 75 वर्ष बाद जब मैं फिल्म के माध्यम से दुनिया के सामने उन बातों को ला रहा हूं तो विरोध करने वालों को किस बात का डर है? राष्ट्र का हक है सच जानना। गोडसे ने किन परिस्थिति में कृत्य किया? इससे पहले गोडसे का क्या क्रिमिनल रिकॉर्ड था? फिल्म में भी एक डायलॉग है कि- 'विचार रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन जान लेने का किसी को नहीं है।'
- फिल्म देखने के बाद दर्शक गांधी या गोडसे में से किसी को सही या गलत ठहरा पाएंगे?

राजकुमार : यूं तो अपने नजरिए पर बहुत कुछ निर्भर करता है, लेकिन मुझे विश्वास है कि दर्शकों को उनके प्रश्नों के जवाब मिल जाएंगे। क्योंकि सेंसर बोर्ड में फिल्म गई थी तो 18 विशेषज्ञों ने क्लीन यू सर्टिफिकेट दिया। कुछ ने तो कहा कि इसे स्कूल कॉलेजों में नि:शुल्क दिखाना चाहिए।
*- फिल्म में क्या दोनों किरदारों को बैलेंस करने की कोशिश की गई है? कैसे की?

राजकुमार : फिल्म के लेखक अजगर वजाद और मैं एक-दूसरे को क्रॉस चेक करते थे कि किसी पर कोई किरदार हावी तो नहीं हो रहा है? गांधीजी और गोडसे दोनों के जवाबों को एक-दूसरे के साथ समान काउंटर किया गया है और बराबर सीन रखे गए हैं। जैसे- गोडसे ने कहा कि देश व धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी जरूरी है। वहीं, गांधीजी का जवाब है कि इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन हिंसा है। मैं भी एक जिम्मेदार निर्देशक के तौर पर जाना जाता हूं। अपने कैरियर में हिंसक व अश्लील फिल्में नहीं बनाई। किसी पार्टी से भी जुड़ा नहीं हूं, ना ही ट्विटर या सोशल मीडिया पर हूं।
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- फ़िल्म नई पीढ़ी को क्या कुछ दे पाएगी?
राजकुमार : सोचने पर मजबूर करेगी और सोच से ही सब कुछ जन्म लेता है। भगतसिंह पर फिल्म बनाने का उद्देश्य ही यही था कि मोबाइल पर जीने वाली नई पीढ़ी सोचने पर मजबूर हो। इसके बाद वे गूगल, यूट्यूब व किताबों में ढूंढेंगे कि फिल्म में कितना सच है? वर्षों तक सच दबाने से भविष्य में विस्फोट होता है। जख्म को जितना खुला छोड़ दोगे, उतनी जल्दी भरते हैं।

o गाेडसे को प्रस्तुत करना भी बड़ा चैलेंज :
फिल्म के सहनिर्माता शिवम त्रिवेदी पत्रिका को बताते हैँ कि फिल्म में राष्ट्रपिता के सम्मान को ध्यान में रखते हुए गोडसे को प्रस्तुत करना बड़ी चुनौती थी। आज देश की रक्षा के लिए गांधी- गोडसे दोनों प्रासंगिक हो सकते हैं। राजकुमार संतोषी के ही बस की बात थी कि 75 वर्ष से छुपे संवेदनशील तथ्यों पर फिल्म बनाना। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के लिए नहीं, बल्कि छुपाए गए इतिहास के भविष्य का डिस्कवरी डाक्यूमेंट होगी। जिसे सालों बाद तक पीढि़यां सर्च करके देखती रहेगी।