
GULABO SPECIAL: राजस्थान से सूरत आना मानों ‘राजस्थान’ ही आना-गुलाबो
सूरत. दुनियाभर में भारत व राजस्थान की विशेष नृत्य कला को एक खास मुकाम दिलाने में गुलाबो का बड़ा नाम है। विश्व के बड़े संगठन यूनेस्को में कालबेलिया नृत्य को दर्ज कराने में अंतर्राष्ट्रीय कलाकार गुलाबो ही मुख्य है, लेकिन बावजूद इसके वह ‘कालबेलिया’ शब्द से अधिक सहमति नहीं रखती है। गुलाबीनगर जयपुर से गुलाबो सपेरा एंड पार्टी सोमवार को सूरत में आयोजित फागोत्सव में भाग लेने आई थी। इस दौरान उन्होंने राजस्थान पत्रिका संवाददाता से समाज, बेटी समेत कई विषयों पर खुलकर बातचीत की है।
-कालबेलिया समाज के प्रति रखती है इतर विचार
गुलाबो बातचीत में बताती है कि भगवान शिव के नौ नाथ शिष्यों में से एक हमारे समाज के गुरु कानिफनाथ भी हैं। भगवान शिव ने एक बार सभी को जंगल से कुछ लाने को कहा और गुरुदेव जहर लेकर आए। इस पर महादेव ने कहा, जो लाए हो, उसे खा लो-पी लो। गुरु कानिफनाथ ने जब भगवान के आदेश की पालना की तो उन्हें वरदान मिला कि भविष्य में तुम्हारा वंश जंगली जड़ी-बूटी, सांप पालना, जहर निकालना, देसी उपचार करने का काम करोगे। वर्षों से घुमंतु परिवार के रूप में हमें जहां भी रहते हैं वहां जोगियों का डेरा, नाथों का डेरा ही बोला जाता है। हमारे समाज में भी लोग आपस में कालबेलिया नहीं बोलते हैं।
-ऐसी स्थिति में कालबेलिया नृत्य कहां से आया?
गुलाबो-इसकी भी बड़े मजेदार कहानी है। 45-50 साल पहले तक हमारे समाज में महिलाएं कहीं भी नाचने नहीं जाती थी। यह सच है कि वो घर-घर गीत गाकर मांगती जरूर थी। समाज के पुरुष ही केवल वर्ष में फागुन के महीने में महिला वेष में नृत्य करने गांवों में जाते थे। मेरे पिताजी देवी उपासक थे और वाद्ययंत्र बजाकर गाते थे। उनके साथ मैं जाती और बचपन से सांपों के साथ खेलने-नाचने की वजह से नाचती-गाती थी। अब कब इसे कालबेलिया नृत्य का तमगा मिल गया, मुझे भी पता ही नहीं। यूनेस्को में भी इसे कालबेलिया नृत्य के रूप में ही दर्ज कर लिया गया।
-इसे बदलने के प्रति लगातार सक्रिय
गुलाबो- जब मैं अमेरिका गई तो वहां मुझे गुलाबीनाथ बोला गया तो मैंने लोगों को रोका। उनके पूछने पर बताया कि नाथ पुरुषों के नाम के साथ लगाया जाता है अगर आप बोलना ही चाहते हैं तो मुझे गुलाबो सपेरा बोलिए, क्योंकि मैं हूं भी वहीं। तब से ही सपेरा सरनेम और सपेरा नृत्य को लेकर लगातार आगे बढ़ रही हूंं। यह नृत्य भी मेरे ही द्वारा तैयार किया गया है तो जितने भी शिष्य व सीखने वाले हैं, उनके बीच सपेरा नृत्य के नाम से ही अब यह लोकप्रिय होता जा रहा है।
-पांच मीटर का घाघरा, ढाई मीटर की चुंदड़ी...
गुलाबो-मैं आज जो कुछ भी हूं, उसमें माता-पिता, तृप्ति मेडम-हिम्मत सर व राजस्थान पत्रिका का बड़ा योगदान है। पिताजी की मृत्यु के बाद भी जब मैं विकट परिस्थिति होने के बावजूद 1983 में अमेरिका जा रही थी तब राजस्थान पत्रिका ने ही लिखा था ‘पांच मीटर का घाघरा, ढाई मीटर की चुंदड़ी में लिपटकर गुलाबो अमेरिका चली...।’ इस खबर ने मुझे भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में अलग पहचान दिलवाई। 2016 में जब भारत सरकार ने मुझे पद्मश्री से सम्मानित किया, तब भी पत्रिका ने 1983 की उस घटना को याद किया।
-पुष्कर के धोरों से दुनिया के पौने दो सौ देश तक सफर
गुलाबो-बीन बजाते-सांपों के साथ खेलते-नाचते पहली बार पुष्कर मेले में नाच रही थी। तभी तत्कालीन अधिकारी तृप्ति पांडेय व हिम्मत सर की नजर मुझ पर पड़ी। वहां से जो चली तो मेरे जीवन के इस सफर में अभी तक पौने दो सौ देशों तक पहुंच चुकी हूं। आज दुनिया में सपेरा नृत्य सीखने वाले शिष्य रूपी स्टुडेंट की संख्या हजारों-लाखों में है। मेरा डांस स्कूल खोलने का सपना भी जल्द ही पुष्कर में पूरा होने वाला है। कोरोना महामारी की वजह से इसमें थोड़ी रुकावट आ गई थी। यहां सपेरा डांस के साथ हस्तकला, जड़ी-बूटी की पहचान व उपचार, सर्पों के बारे में भी पढ़ाया-सिखाया जाएगा।
-फ्यूजन नहीं कनफ्यूजन है...
गुलाबो- 1992-93 में जब पेरिस में एक कार्यक्रम के दौरान दुनिया के 10-12 आर्टिस्टों ने सामूहिक रूप से एक प्रस्तुति दी थी। उसमें भारत की ओर से मैंनें प्रतिनिधित्व किया था। प्रस्तुति के बाद मुझे पता चला कि यह फ्यूजन है, लेकिन सच में वह बड़ा कनफ्यूजन था। मेरा मानना है कि जो आए वो गाए और जो भाए वो खाए...। उस दौरान भी मैंने ऐसा ही किया था और लोगों को वह बहुत पसंद आया। आज भी मैं कहीं भी अतिथि रूप में जाती हूं तो डांस परर्फोमेंस अवश्य देती हूं...लोग फिर भले ही कुछ भी बोले।
-घुमंतु समाज ने कन्याभ्रूण हत्या का पाप छोड़ा
गुलाबो-मुझे पैदा होते ही जमीन में दफना दिया था, क्योंकि हमारे समाज में लड़कियों को पाप मानते थे। ेरे पिताजी देवी उपासक थे और उनकी दी सीख व संघर्ष से आज मुझे यह कहते हुए गर्व होता है कि हमारे समाज ने कन्याभ्रूण हत्या का पाप छोड़ दिया है। समाज में बेटी की क्या कद्र होगी, इससे ही समझा जा सकता है कि गुलाबो महिला होने के बावजूद सपेरा समाज की पंच-पटेल में मुख्य भूमिका में शामिल है। समाज अब बच्चियों को पढ़ाने के प्रति भी काफी जागरूक होता जा रहा है और परंपरागत नृत्य, हस्तकला, बीमारी-उपचार का जड़ी-बूटी ज्ञान में भी उन्हें आगे रख रहा है।
-मानों सूरत नहीं पीहर में आ गई
2009 में राजस्थान युवा संघ ट्रस्ट के फागोत्सव में फ्रांस से सीधे सूरत आई थी। उसके बाद मेरे व बच्चों के खूब मन में था कि होली पर सूरत जाए और कार्यक्रम करें। 14 साल बाद यह अवसर मिला है या यूं कहे वनवास छूटा है कि मैं परिवार के साथ सूरत आई हूं। राजस्थान से सूरत आने को राजस्थान आना अथवा पीहर आना कहें तो भी कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि यहां पर जिस तरह से अपनों का अपनापन मिलता है वो दुनिया के किसी कोने अथवा शहरों में नहीं मिलता।
Published on:
11 Mar 2023 10:24 am
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