
प्रहार....शर्मनाक करतूत, कानून के साथ ईमान का भी सौदा!
- राजेश कसेरा
सूरत के सरथाणा थाने में वर्दी की आड़ में जिस तरह से वसूली का खेल हुआ, उसने गुजरात पुलिस की छवि को दागदार कर दिया। गलत कमाई के लालच में चार पुलिसवालों ने न केवल कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाईं, बल्कि समूचे तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। वैसे ही पुलिस की छवि सामान्य नागरिक के दिलो-दिमाग में ठीक नहीं है। आम तौर पर कहा भी जाता है कि एक बार 'चोर' पर विश्वास कर लेंगे, पुलिस पर नहीं। इसका बड़ा कारण सरथाणा थाना प्रभारी और तीन अन्य पुलिसकर्मियों जैसों का अंधा लालच है, जिसने वर्दी के साथ ईमान तक का सौदा कर लिया। पुलिसिया रौब के बूते उगाई करने का यह कोई पहला मामला नहीं है।
तकरीबन रोजाना थानों, चौकियों से लेकर 'ऊपर' तक के कार्यालयों में सौदेबाजी का राक्षस, सुरसा की मानिंद मुंह खोले बैठा रहता है। कानून की सामान्य से लेकर संगीन धाराओं तक का रेटकार्ड के मुताबिक हिसाब-किताब होता है। हर मामले में कितना पैसा लेना है, जेब देखकर कितना बढ़ाना है, सब समय और परिस्थितियों के आधार पर बदल जाता है। तभी तो टैक्स चोरी के मामले में आरोपियों को सलाखों के पीछे डालने के बजाय सरथाणा थाने के प्रभारी एन.डी. चौधरी ने मामले को रफा-दफा करने के लिए एक करोड़ रुपए की रिश्वत मांग ली। इस काली करतूत को अंजाम देने वाले षडयंत्र में पुलिस उप निरीक्षक एच.एम. गोहिल, कांस्टेबल गोपाल डाह्या और भगू राधव को मिला लिया गया।
न मुकदमा दर्ज किया, न ही रोजनामचे में कोई रपट डाली। सिर्फ वर्दी का रसूख दिखाकर आरोपियों को सलाखों के पीछे डाल दिया और एक-एक कर इतनी धाराएं गिना दीं कि बात नहीं मानी तो उन सबका जेल जाना तय है। इसके बाद साढ़े तीस लाख रुपए हड़प लिए और डकार तक नहीं ली। सूरत पुलिस के इस कृत्य ने विभाग के उन ईमानदार कार्मिकों को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है, जो निष्ठा और साहस से ड्यूटी करने का दंभ भरते हैं।
इस मामले से दीगर बात करें तो गुजरात में पुलिस का सबसे बड़ा स्याह पक्ष यह भी है कि प्रदेश में बरसों से शराबबंदी लागू होने के बावजूद शराब जब्ती के सैकड़ों प्रकरण हर साल दर्ज होते हैं। करोड़ों रुपए की शराब गुजरात में खुलेआम बेची और पी जाती है। कौन शराब नेटवर्क को चलाता है, इसकी पूरी सूची पुलिस के पास रहती है, लेकिन कार्रवाई तभी होती है, जब कोई बड़ा जघन्य कांड सामने आता है। इसके इतर ड्रग्स और हवाले का अवैध कारोबार भी बड़े पैमाने पर चलता है, जो पुलिस की सांठ-गांठ से पोषित होता रहता है।
हालांकि सारे पुलिस वाले बेईमानी के कारोबार में लिप्त नहीं होते, लेकिन एक मछली काफी है पूरे तालाब को गंदा करने के लिए। ऐसे में पुलिस की छवि और दागदार हो, इससे पहले सरथाणा प्रकरण में कड़ी कार्रवाई कर उन भ्रष्ट पुलिसवालों को कड़ा सबक सिखाना होगा, जिन्होंने समूचे विभाग को बदनाम करने का दुस्साहस दिखाया है। फिलहाल चारों पुलिसकर्मी फरार हैं और तंत्र के अंदरूनी दांव-पेच से बखूबी वाफिक भी। इस बाद से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि विभाग के भीतर बैठे उनके सरपरस्त मदद कर रहे होंगे।
चुनौतियां और भी होंगी, पर सबसे पार पाकर ठोस परिणाम देने होंगे, क्योंकि यहां पुलिस की साख से ही सौदा किया गया है। अभी नहीं तो कभी नहीं वाली उक्ति को ध्यान में रखकर ही कारगर कदम उठाएंगे तभी पुलिस का इकबाल बुलंद रह पाएगा।
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rajesh.kasera@epatrika.com
Published on:
09 Apr 2019 04:46 pm
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