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एमओयू के अलावा भी अंकित ने बैंक से उठा लिए थे लोन

डांग में सीएसआर प्रकरण के मास्टर माइंड शातिर अंकित मेहता ने लाजपोर जेल के एमओयू के अलावा भी नवसारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की...

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In addition to the MOU, Ankit had raised the loan from the bank.

In addition to the MOU, Ankit had raised the loan from the bank.

सूरत।डांग में सीएसआर प्रकरण के मास्टर माइंड शातिर अंकित मेहता ने लाजपोर जेल के एमओयू के अलावा भी नवसारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य शाखा से लोन लिए थे। सीआइडी क्राइम ने बुधवार को लाजपोर जेल से एमओयू की प्रति और बैंक लोन के दस्तावेज जब्त किए हैं।

मामले की जांच कर रहे सीआइडी के उप निरीक्षक एम.एस.सरवैया ने बताया कि अंकित मेहता ने २०१५ में लाजपोर सेंट्रल जेल के तत्कालीन अधीक्षक आर.एम.पांडे को एम.के.फूड्ज यूनिवर्सल ग्रुप कंपनी के सीइओ मेहुलसिंह वाघेला के रूप में पहचान देकर एमओयू साइन किया था। इसमें कंपनी द्वारा कैदियों की ओर से तैयार किए जाने वाले खाद्य पदार्थों की मार्केटिंग कर उन्हें बाजार में पहुंचाने की रूपरेखा के बारे में बताया गया था। इस एमओयू का उपयोग कर उसने नवसारी टाउन में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य शाखा से नौ लाख रुपए का लोन लिया था। वाघेला ने बताया कि बैंक लोन उसने अपने नाम से लिया। उसने बैंक में खुद को कंपनी का मालिक और मेहुलसिंह को कंपनी का सीइओ बताया था।

बैंक में लोन के लिए दिए गए दस्तावेज कब्जे में लिए गए हैं। लाजपोर जेल से एमओयू की प्रति भी कब्जे में ली गई है। कागजात की जांच की जा रही है। उन्होंने बताया कि भावेश्री दावड़ा और अंकित डांग पुलिस की हिरासत में हैं। उनसे पूछताछ के लिए कोर्ट से प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि डांग सीएसआर प्रकरण में पुलिस के हत्थे चढ़े बंटी-बबली अंकित और भावेश्री ने डांग जिला प्रशासन के अलावा लाजपोर जेल तथा स्टेट बैंक के साथ भी धोखाधड़ी की थी। तीन साल पहले उन्होंने जेल से कैदियों के कल्याणार्थ फर्जी एमओयू कर बैंक से ९ लाख रुपए का लोन लिया था। इस संबंध में लाजपोर जेल प्रशासन ने मंगलवार को सीआइडी (क्राइम) की सूरत इकाई में प्राथमिकी दर्ज करवाई थी।

किस्तों की हो रही थी भरपाई

सरवैया ने बताया कि अंकित मेहता ने नवसारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से एमओयू के जरिए लिए गए नौ लाख रुपए के लोन के अलावा और भी लोन ले रखे हैं, जो अलग-अलग कंपनियों के नाम पर हैं। उनके बारे में बैंक से जानकारी जुटाई जा रही है। एमओयू के जरिए उसने नौ लाख रुपए का जो लोन लिया था, उसकी किस्तों की वह भरपाई भी कर रहा था। कई बार किस्त जमा करने में देरी होती थी, लेकिन किस्तों की भरपाई हो रही थी। इस वजह से बैंक को उस पर संदेह नहीं हुआ और बैंक ने अपनी ओर से कोई शिकायत दर्ज नहीं करवाई।

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