6 अप्रैल 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जानिए कहां समुद्र देव रोजाना करते हैं महादेव का अभिषेक

श्रावण विशेषताड़कासुर का वध करने के बाद शिव पुत्र कार्तिकेय ने स्थापित किया था शिवलिंगसमुद्र में समा जाता है शिव मंदिर

2 min read
Google source verification

सूरत

image

Sunil Mishra

Jul 29, 2018

patrika

shiv mandir


बालकृष्ण पाण्डेय
भरुच. शायद आपको यकीन न हो, लेकिन एक शिव मंदिर ऐसा भी है जो समुद्र की तेज लहरों में नजरों से ओझल हो जाता है और कुछ देर बाद वापस बाहर आ जाता है। भगवान शिव का यह रूप स्तंभेश्वर महादेव के रूप में जाना जाता है। यह शिव मंदिर भरुच जिले की जंबूसर तहसील के कावी कंबोई गांव में समुद्र किनारे स्थित है। कावी-कंबोई बड़ोदरा शहर से ७५ किमी तथा भरुच शहर से ६० किमी की दूरी पर स्थित है।
भगवान शिव के इस मंदिर की खोज लगभग २०० साल पूर्व हुई, लेकिन यह मंदिर काफी प्राचीन है। स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग के दर्शन दिन में केवल एक बार ही होते हैं, बाकी समय यह मंदिर समुद्र में डूबा रहता है। समुद्र तट पर दिन में दो बार ज्वार-भाटा आता है। ज्वार-भाटे के कारण पानी मंदिर के अंदर पहुंच जाता है। इस प्रकार समुद्र का पानी दिन में दो बार शिवलिंग का जलाभिषेक कर वापस लौट जाता है। यह घटना प्रतिदिन सुबह और शाम घटित होती है। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से पानी में समा जाता है। इस दौरान यहां किसी को जाने की अनुमति नहीं मिलती है। स्तंभेश्वर महादेव का दर्शन के लिए दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं को खास तौर पर पर्चे बांटे जाते हैं जिसमें ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है, ताकि उस वक्त मंदिर में कोई न रहे।


शिव पुराण में भी है मंदिर का जिक्र
स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का जिक्र शिव पुराण में रुद्र संहिता के एकादश अध्याय में मिलता है जो इस शिव धाम के प्राचीन होने का प्रमाण है। स्कंद पुराण में भी इस मंदिर के निर्माण के बारे में काफी विस्तार से बताया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार ताड़कासुर राक्षस ने अपनी कठोर तपस्या से शिव को प्रसन्न कर लिया और अमर होने का वरदान मांगा। इस वरदान को नकारने पर ताड़कासुर ने दूसरा वरदान मांगा कि उसे सिर्फ शिव पुत्र ही मार सके और वह भी छह दिन की ही आयु का। वरदान पाने के बाद ताड़कासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचाना शुरू कर दिया। सभी देवता व ऋषि मुनि उसके आतंक से परेशान होकर महादेव की शरण में पहुंचे तब श्वेत पर्वत के पेड़ से कार्तिकेय का जन्म हुआ और उन्होंने असुर का वध किया। जब भगवान कार्तिकेय को पता चला कि ताड़कासुर उनके पिता भोलेनाथ का परम भक्त था तो वे आत्मगलानि से भर उठे। इस पर भगवान विष्णु ने उन्हें एक उपाय बताया कि वे यहंा पर (कावी स्थान) एक शिवलिंग की स्थापना करें और रोजाना माफी के लिए प्रार्थना करें। इस तरह से यह शिवलिंग यहां पर स्थापित हुआ और तब से ही इस तीर्थ स्थल को स्तंभेश्वर कहते हैं। भरुच जिले के कावी कंबोई में स्थापित स्तंभेश्वर महादेव मंदिर अरब सागर में बना है। जब समुद्र में तेज तूफान आता है तब मंदिर का शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है, जिसके कारण वह दिखाई नहीं देता है। लोगों को इस चमत्कार को देखने के लिए दिनभर रुकना पड़ता है। स्तंभेश्वर महादेव मंदिर को गुप्त तीर्थ भी कहा जाता है। यहां पर भक्तों के रहने व भोजन की व्यवस्था है। वर्तमान में मंदिर का संचालन स्वामी विद्यानंद महाराज की ओर से किया जा रहा है।