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मानसिक स्वास्थ्य सभी के लिए बुनियादी मानव अधिकार : डॉ. ऋतंभरा

- नई सिविल अस्पताल में हर साल इलाज के लिए पहुंचते है 50 से 55 हजार मरीज - 10 अक्टूबर को मनाया जाता है 'विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस'

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मानसिक स्वास्थ्य सभी के लिए बुनियादी मानव अधिकार : डॉ. ऋतंभरा

मानसिक स्वास्थ्य सभी के लिए बुनियादी मानव अधिकार : डॉ. ऋतंभरा

सूरत. मानसिक स्वास्थ्य को मानव अधिकार के रूप में बनाए रखने वाली स्वास्थ्य प्रणालियों को बढ़ावा देने व जागरुकता के लिए 10 अक्टूबर को 'विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस' मनाया जाता है। 2023 में 'हमारा मन, हमारा अधिकार' की थीम तय की गई है। मानसिक स्वास्थ्य सभी के लिए एक बुनियादी मानव अधिकार है। अच्छा मानसिक स्वास्थ्य स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए महत्वपूर्ण है। फिर भी वैश्विक स्तर पर आठ में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारी की स्थिति के साथ जी रहा है, जो उनके शारीरिक स्वास्थ्य, उनकी भलाई, लोगों और परिवार के साथ संबंध और आजीविका को प्रभावित कर सकता है। मानसिक अस्वस्थता, मानसिक विकार किशोरों और युवा वयस्कों को भी प्रभावित कर रहे हैं।

सूरत सिविल अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग की प्रमुख डॉ. ऋतंभरा मेहता ने बताया कि वर्ष 2022 में सूरत नई सिविल अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग की ओपीडी में कुल 53,494 मरीज इलाज के लिए पहुंचे और इनमें 863 गंभीर मरीजों को भर्ती कर इलाज किया गया। नई सिविल के मनोचिकित्सा विभाग की ओपीडी में प्रतिदिन मानसिक रोगों से पीडि़त 200 से 250 मरीज आते हैं। यहां बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य एवं नशामुक्ति शाखा भी है। आज के दौर में नशे और सामान्य मानसिक विकारों के कारण आत्महत्या की दर भी बढ़ गई है। विशेष रूप से 15 से 25 वर्ष के युवाओं और छात्रों में दिखावे की चाहत, विलासितापूर्ण जीवन जीने और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग करने के कारण अवसाद से ग्रस्त होने की आशंका अधिक होती है। उन्हें इस समस्या से बचाने के लिए मानसिक समर्थन, परामर्श और गर्मजोशी की आवश्यकता है। अगर हम किसी व्यक्ति के चिंता, अवसाद, संकट में होने पर उससे बात करते हैं और उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाते हैं, तो यह भी एक सेवा कार्य है। डॉ. ऋतंभरा ने बताया कि आज सामान्य मानसिक समस्याओं में चिंता, तनाव, अवसाद, शारीरिक दर्द, व्यसन, तनाव जैसी समस्याएं बढ़ गई हैं। कोरोना काल के बाद मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विश्व स्तर पर लोगों की जागरूकता बढी है। मानसिक समस्याओं से ग्रस्त होने के बावजूद लोग डॉक्टर के पास जाने से कतराते हैं। समस्या के लक्षणों के बावजूद पीडि़त यह स्वीकार नहीं करता कि उसे कोई मानसिक समस्या है। बुजुर्गों में भी निराशा और अवसाद देखा जाने लगा है। संयुक्त परिवार प्रथा समाप्त होती जा रही है। लोगों में बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहने की बजाय अलग रहने की मानसिकता उभर रही है। इसलिए माता-पिता अलग-थलग रहते हैं। जिससे उन्हें अकेलापन लगता है। पुरानी पीढ़ी के मित्रों और समाज के समर्थन की कमी से वे अकेले हो जाते हैं।

मानसिक अस्वस्थता कलंक नहीं, चुनौती समझें

हम मानसिक विकार को कलंक न समझें, बल्कि इसे चुनौती के रूप में लें और इससे बाहर आएं। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए सरकारी स्तर पर भी प्रयास किए जा रहे हैं। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1982 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनएमएचपी) शुरू किया गया था। इसके बाद 10 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा की गई।